

आईसीएआर–राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान (ICAR-NIBSM) ने किसानों को रोग की पहचान और बचाव के उपायों की दी सलाह
प्रविष्टि तिथि: 02 SEP 2026
Raipur chhattisgarh VISHESH / धान में बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट एक महत्वपूर्ण जीवाणुजनित रोग है, जो छत्तीसगढ़ सहित देश के प्रमुख धान उत्पादक क्षेत्रों में फसल को प्रभावित कर सकता है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान ने किसानों को रोग की समय पर पहचान करने तथा इसके प्रभावी प्रबंधन के लिए खेतों की नियमित निगरानी और समेकित रोग प्रबंधन अपनाने की सलाह दी है। यह रोग मुख्य रूप से Xanthomonas oryzae pv. oryzae नामक जीवाणु के कारण होता है।

बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट की शुरुआत सामान्यतः धान की पत्तियों के किनारे या सिरे से होती है। संक्रमित पत्तियों पर पानी से भीगे हुए हल्के पीले अथवा पीले-हरे धब्बे या धारियां दिखाई देती हैं। संक्रमण बढ़ने पर ये लक्षण पत्ती के बड़े हिस्से में फैल जाते हैं और पत्तियां पीली होकर भूसे के रंग की दिखाई देने लगती हैं तथा अंततः सूख सकती हैं। पौधे की प्रारंभिक अवस्था में गंभीर संक्रमण होने पर ‘क्रेसेक’ की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसमें पौधे मुरझाने लगते हैं।
संस्थान के अनुसार, रोग की समय पर पहचान महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण कई अन्य पत्ती रोगों से मिलते-जुलते हो सकते हैं। खेत में संदिग्ध पौधे दिखाई देने पर किसानों को वैज्ञानिकों, कृषि विशेषज्ञों, कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग से रोग की पुष्टि कराने की सलाह दी गई है।
बैक्टीरियल ब्लाइट के विकास के लिए सामान्यतः 25 से 34 डिग्री सेल्सियस तापमान और 70 प्रतिशत से अधिक सापेक्ष आर्द्रता अनुकूल मानी जाती है। लगातार बारिश, तेज हवा, अधिक नमी और खेत में पानी की अधिकता रोग के विकास तथा प्रसार को बढ़ा सकती है। इसके अलावा, नाइट्रोजन उर्वरक का अत्यधिक उपयोग, विशेषकर देर से की गई अधिक मात्रा की टॉप ड्रेसिंग, रोग की गंभीरता बढ़ा सकती है।
रोग प्रबंधन के लिए प्रतिरोधी या सहनशील किस्मों का चयन, संतुलित पोषण, उचित जल प्रबंधन, खेत की स्वच्छता और समेकित रोग प्रबंधन को प्राथमिकता देने की सलाह दी गई है। आवश्यकता और वर्तमान सरकारी अनुशंसा के अनुसार कॉपर आधारित रसायनों, जैसे कॉपर ऑक्सीक्लोराइड, का उपयोग किया जा सकता है। कॉपर ऑक्सीक्लोराइड के उपयोग की मात्रा स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विशेषज्ञ की वर्तमान अनुशंसा के अनुसार निर्धारित की जानी चाहिए।
संस्थान ने किसानों को एंटीबायोटिक के अनावश्यक, बार-बार अथवा अधिक मात्रा में छिड़काव से बचने की सलाह दी है, क्योंकि इससे एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध की समस्या बढ़ सकती है। किसी भी रसायन या एंटीबायोटिक का उपयोग केवल वर्तमान सरकारी अनुशंसाओं और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार ही किया जाना चाहिए।
किसानों से विशेष रूप से वर्षा और अधिक आर्द्रता वाले मौसम में धान के खेतों की नियमित निगरानी करने तथा पत्तियों के किनारों से शुरू होने वाला पीलापन, पानी से भीगे हुए धब्बे या धारियां, पत्तियों का भूसे के रंग में बदलना और पौधों के मुरझाने जैसे लक्षण दिखाई देने पर तत्काल सतर्कता बरतने की अपील की गई है। समय पर पहचान, संतुलित कृषि प्रबंधन और वैज्ञानिक सलाह के अनुरूप उपचार से रोग के प्रभाव को कम किया जा सकता है।





















