

पी.वी. सिंधु
Raipur chhattisgarh VISHESH / क्या होता अगर दस साल पहले कोई भारतीय युवा लड़की कहती कि उसे रॉकेट बनाना है। उसे इसरो में शामिल होकर नहीं, बल्कि अपना खुद का रॉकेट बनाना है। ऐसी स्थिति में शायद उसके आसपास के लोग खामोश रह जाते। फिर कोई बहुत सहानुभूति से उसे समझाता कि यह उसके बस की बात नहीं है। वह समझाता की अंतरिक्ष पर सिर्फ सरकार का हक होता है। इतने बड़े सपने तो दूसरे देशों के लोगों के लिए होते हैं।
18 जुलाई, 2026 को एक प्राइवेट भारतीय कंपनी का बनाया रॉकेट अंतरिक्ष की कक्षा में पहुंच गया। इस रॉकेट को स्काईरूट ने बनाया था, जिसकी बुनियाद दो नौजवान इंजीनियरों ने रखी थी। दोनों ने अपने सुरक्षित काम छोड़ कर इस लगभग नामुमकिन सपने को सच करने की ठान रखी थी। स्काईरूट की इस कामयाबी के साथ ही भारत दुनिया के उन सिर्फ तीन देशों में शामिल हो गया जहां किसी आम नागरिक की प्राइवेट कंपनी अंतरिक्ष तक पहुंच सकती है। इस कामयाबी को हासिल करने वाले बाकी दो देश अमेरिका और चीन हैं। वह लड़की, जिसके सपने के पूरा होने का किसी को भी भरोसा नहीं था, अब कह सकती है- ‘‘मैं एलन मस्क बनना चाहती हूं। यह कोई नारा नहीं, बल्कि मेरा पक्का इरादा है।’’ बेशक, वह अपने सपने को पूरा करने की यात्रा को शुरू कर सकती है।
पिछले दस वर्षों में हमारे देश में प्रतिभाओं में कोई बदलाव नहीं आया है। भारत के पास काबिलियत हमेशा से थी। जो चीज़ बदली, वह था अवसर। हमारे इतिहास में ज्यादातर समय किसी बड़े सपने का जवाब यह होता था कि ऐसा करना मुमकिन नहीं है। इसलिए नहीं कि काबिलियत में कोई कमी थी। इसलिए कि मंजिल तक पहुंचने का दरवाजा ही बंद था। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की सबसे खामोश और सबसे बड़ी कामयाबी यह रही कि अब वह दरवाजा खुल चुका है।
इस बदलाव की गहराई को समझना बहुत जरूरी है। दशकों तक भारत में हर बड़े सपने को रुकावटों का सामना करना पड़ता था। कोई भी अहम काम करने के लिए आपको लाइसेंस, मंजूरी, जान-पहचान या प्रभावशाली परिवार के नाम की जरूरत पड़ती थी। देश में सपने देखने वालों की कभी कोई कमी नहीं थी। कमी थी तो सिर्फ दरवाजों की। और जब दरवाज़े कम हों तो वे सबसे पहले उनके लिए खुलते हैं जिनके पास पहले से चाबियां होती हैं। नौजवान, गरीब और वे लोग दरवाज़े के बाहर ही इंतज़ार करते रह जाते थे जिनके पास कोई बड़ी पहचान नहीं थी। प्रधानमंत्री मोदी ने इस बंद दरवाजे को देखा और समझा कि असल में इसके क्या कारण थे। उन्होंने इस बदलाव को एक ही लाइन में बयान किया- सरकार का रवैया ‘जब तक इजाज़त न हो, तब तक पाबंदी’ से बदल कर ‘जब तक मना न हो, तब तक इजाज़त’ हो गया है। उनके पूरे दशक के काम के पीछे एक पक्का संकल्प रहा है- पाबंदियों की इस दीवार को गिराना और उसकी जगह खुले दरवाज़ों वाला देश बनाना। ऐसा देश जहां इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किसकी संतान हैं। फर्क इससे पड़ता है कि आप क्या बनाने की काबिलियत रखते हैं।
जरा गौर करें कि क्या-क्या खुल गया है। अंतरिक्ष पर 60 साल तक सरकार का एकाधिकार रहा। 2020 में उसे उन सबके लिए खोल दिया गया जिनके पास रॉकेट छोड़ने की योग्यता थी। फिर हमारे खेतों के ऊपर का आसमान खुला। उस रूल बुक को फाड़ कर फेंक दिया गया जिसके मुताबिक एक छोटे से ड्रोन को उड़ाने के लिए दर्जनों कागज़ात और इजाज़तों की ज़रूरत पड़ती थी। अब किसी छोटे शहर का कोई नौजवान अपना ड्रोन बना सकता है। उसे फोन के जरिए रजिस्टर कर अपना कारोबार शुरू कर सकता है। गांवों की हज़ारों महिलाओं के हाथों में ड्रोन सौंप दिए गए जिससे भविष्य का एक हिस्सा उनकी आजीविका का जरिया बन गया।
इनमें से कुछ बदलाव बहुत दबे पांव आए लेकिन उनकी अहमियत उतनी ही ज्यादा थी। 2021 में मानचित्रों को मुक्त कर दिया ताकि किसी भारतीय कंपनी को उस देश का सर्वे करने के लिए किसी मंजूरी की ज़रूरत नहीं पड़े जिसमें वह पहले से काम कर रही है। 2023 में एक ही कानून के ज़रिए सैकड़ों कानूनों में बदलाव किया गया। इस कानून के जरिए एक हज़ार से ज्यादा वैसे मामलों में आपराधिक सजा के प्रावधान को खत्म कर दिया गया जिनका संबंध कागजी औपचारिकताओं से था। उद्देश्य यह था कि सिर्फ एक फॉर्म छूट जाने पर किसी को जेल नहीं जाना पड़े।
2014 में अंतरिक्ष से संबंधित सिर्फ एक स्टार्टअप था। लेकिन आज भारत में ऐसे लगभग 440 स्टार्टअप हैं। उस समय कोई भी ड्रोन स्टार्टअप नहीं था मगर अब इनकी संख्या सैंकड़ों में पहुंच चुकी है।
लेकिन सिर्फ दरवाजे खोलना अधूरी बात होगी। एक खुले दरवाज़े का कोई फायदा नहीं अगर वहां तक पहुंचने का आपके पास कोई रास्ता ही न हो। यहीं पर इस सोच की न्यायसंगतता नजर आती है। 2016 में स्टार्टअप इंडिया की शुरुआत के समय देश में करीब 350 मान्यता प्राप्त स्टार्टअप थे। आज इनकी संख्या दो लाख से ज़्यादा है और इन्होंने बीस लाख से ज़्यादा नौकरियां सृजित की हैं। ये अब सिर्फ़ बैंगलोर या दिल्ली तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि देश के हर कोने में छोटे शहरों और कस्बों तक पहुँच चुके हैं, जिनमें से एक लाख से भी अधिक की शुरुआत महिलाओं द्वारा की गई है।
ये ऋण खास तौर पर उन लोगों के लिए थे जिन्हें पुरानी व्यवस्था में नज़रअंदाज़ किया गया था – जैसे दलित और आदिवासी परिवारों के पहली बार व्यवसाय शुरू करने वाले लोग और महिलाएँ। साथ ही, करोड़ों ऐसे भारतीय जिनके पास कभी बैंक खाता नहीं था, उन्हें आखिरकार इस दायरे में लाया गया, जहाँ एक साधारण फोन ही बैंक बन गया। आज एक सब्जी बेचने वाला और एक स्टार्ट-अप का संस्थापक दोनों एक ही तरीके से पैसे का लेन-देन करते हैं।
युवाओं को पढ़ाने के तरीके पर भी नए सिरे से सोचा गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने उस व्यवस्था को बदल दिया है जिसके तहत 16 साल के छात्र को किसी एक विषय (स्ट्रीम) में जबरदस्ती दाखिल करा दिया जाता था, जो उसे जीवन भर की सजा की तरह लगता था लेकिन अब यह जीवन भर की सजा की तरह नहीं रहा। अब छात्र ऐसे विषयों को एक साथ पढ़ सकते हैं जिन्हें पहले कभी साथ नहीं पढ़ाया जाता था, किसी डिग्री को बीच में छोड़कर वहीं से दोबारा शुरू कर सकते हैं और देश से बाहर जाए बिना ही विश्वस्तरीय पढ़ाई कर सकते हैं, क्योंकि दुनिया भर के विश्वविद्यालयों ने अब यहीं अपने कैंपस खोलना शुरू कर दिया है।
यह सब एक ही बात की ओर इशारा करता है, एक ऐसा देश जिसने आखिरकार अपने युवाओं पर भरोसा करने का फ़ैसला किया है। हमारे इतिहास के ज़्यादातर समय में, हमारी सबसे प्रतिभाशाली पीढ़ी को लगता था कि कुछ ठोस करने के लिए उन्हें विदेश जाना होगा। हमने उन्हें धीरे-धीरे, साल-दर-साल उन देशों के हाथों खो दिया, जिनके पास ऐसे अनेक अवसर थे जो हमारे पास नहीं थे। यहाँ अंतरिक्ष से लेकर सिलिकॉन तक, सॉफ्टवेयर से लेकर कक्षाओं तक, उन दरवाज़ों को खोलकर इस नेतृत्व ने उस प्रतिभा को देश में रुकने की एक वजह दी है और यहाँ तक कि घर वापस लौटने का एक कारण भी दिया है। भविष्य का निर्माण करना अब कोई ऐसा काम नहीं रहा जिसके लिए आपको भारत छोड़ना पड़े। अब देश में ही रहकर यह काम कर सकते हैं।
और यह वह पक्ष है जिसे कोई भी नीतिगत दस्तावेज़ बयान नहीं कर सकता, वही पक्ष जो बाकी सभी बातों को एक अलग रूप में प्रस्तुत करता है। एक पूरी पीढ़ी को हर तरह का अवसर दिए जाने के बाद भी वे खुद को उपेक्षित महसूस कर सकती है। नरेंद्र मोदी ने भारत के युवाओं को कभी भी ऐसी समस्या नहीं माना जिसे बस ‘मैनेज’ करना हो या सिर्फ़ वोट बैंक समझा हो। वे परीक्षा से पहले छात्रों के साथ बैठकर उनसे डर, दबाव और उम्मीद के बारे में खुलकर बात करते हैं। वे किसी शासक की तरह प्रजा को उपदेश नहीं देते हैं, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की तरह बात करते हैं जो यह याद रखता है कि युवा होना, डरा होना और साथ ही सपनों से भरा होना कैसा होता है। वे युवाओं से बराबरी के स्तर पर बात करते हैं। वे न तो उन्हें नीचा दिखाते हैं और न ही उनकी बात को अनसुना करते हैं। जब कठिन पल आते हैं, तो वे उनका डटकर सामना करते हैं और युवाओं को अपने उदाहरण से दिखाते हैं कि कुछ भी छिपाने की ज़रूरत नहीं है।
यह कोई छोटी बात नहीं है। हो सकता है कि यह सबसे बड़ी बात हो। क्योंकि जब किसी युवा व्यक्ति को काबिल मानकर बात की जाती है तो धीरे-धीरे उसे भी यकीन होने लगता है कि वह वाकई काबिल है। जो युवा खुद को काबिल मानता है, वही किराए के कमरे में रॉकेट कंपनी शुरू करता है और कुछ ही सालों में अंतरिक्ष तक पहुँच जाता है।
हर पीढ़ी को वे सीमाएँ विरासत में मिलती हैं जिन्हें उसने स्वयं नहीं चुना होता। हमारे दादा-दादी को अभाव विरासत में मिला। हमारे माता-पिता को अनुमति और आदेश विरासत में मिले और मिला ऊपर बैठे किसी व्यक्ति के ‘हाँ’ कहने का लंबा इंतज़ार। हमें कुछ अलग विरासत में मिला है: एक ऐसा देश जो आखिरकार इसका निर्माण करने के लिए हम पर विश्वास करता है।
यही इस नेतृत्व का वास्तविक मापदंड है। यह कोई योजना या आंकड़ा नहीं, बल्कि एक युवा भारतीय की सोच और कल्पना के दायरे में आया बदलाव है। जुलाई में अंतरिक्ष तक पहुँचा रॉकेट उन लोगों द्वारा बनाया गया था, जिनसे कभी कहा गया था कि उनके लिए कोई दरवाज़ा ही नहीं खुला है। वह खुला दरवाज़ा अब मौजूद है और ऐसे ही हज़ार अन्य दरवाज़े भी खुले हैं। अब किसी युवा भारतीय के लिए केवल यही सवाल नहीं रह गया है कि उसे सपने देखने की अनुमति है या नहीं; अब सवाल यह है कि वह कितनी दूर जाने का इरादा रखता है।

(लेखक दो बार की ओलंपिक पदक विजेता है और वर्तमान में आंध्र प्रदेश सरकार में डिप्टी कलेक्टर के पद पर कार्यरत है।)





















