

प्रविष्टि तिथि: 09 SEP 2026 6:33PM
एंडोमेट्रियोसिस दुनिया भर में प्रजनन आयु की लगभग 10% महिलाओं को प्रभावित करता है। अनुमान के अनुसार, विश्व स्तर पर लगभग 24.7 करोड़ महिलाएं और भारत में लगभग 5 करोड़ महिलाएं इस बीमारी से प्रभावित हैं। यह एक लंबे समय तक रहने वाली बीमारी है, जिसमें गर्भाशय की अंदरूनी परत के समान ऊतक गर्भाशय के बाहर विकसित होने लगते हैं। इसके कारण मासिक धर्म के दौरान तेज दर्द, लंबे समय तक पेल्विक दर्द, संभोग के दौरान दर्द, थकान, बांझपन, चिंता, अवसाद और जीवन की गुणवत्ता में कमी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। खासकर भारत में इसके निदान में होने वाली देरी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।

भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े शोध में एक महत्वपूर्ण कमी को दूर करते हुए, ICMR–National Institute for Research on Women’s Health (ICMR–NIRWoH), मुंबई के शोधकर्ताओं ने भारतीय महिलाओं में एंडोमेट्रियोसिस के आनुवंशिक जोखिम को समझने के लिए पहली Genome-Wide Association Study (GWAS)की है। यह अध्ययन Scientific Reports, Springer Nature की एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन का शीर्षक है: “Genome-wide association analysis of endometriosis in Indian women supports shared genetic susceptibility and suggestive population-specific signals.”
यह अध्ययन Endometriosis Clinical and Genetic Research in India (ECGRI) पहल का हिस्सा है, जिसका नेतृत्व डॉ. राहुल के. गाजभिये, Scientist E एवं Head, Clinical Research Laboratory, ICMR–NIRWoH नेकिया। इस बहुकेंद्रीय अध्ययन में देशभर के 18 केंद्रों ने भाग लिया। इसमें अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक-पृष्ठभूमि से महिलाओं को शामिल किया गया, जिनमें सर्जरी द्वारा पुष्टि किए गए एंडोमेट्रियोसिस के मरीज और नियंत्रण समूह शामिल थे। एम्स रायपुर भी इस महत्वपूर्ण अध्ययन का एक सहभागी केंद्र था। चार वर्षों की अवधि में एम्स रायपुर में कुल 400 प्रतिभागियों को शामिल किया गया, जिनमें 200 एंडोमेट्रियोसिस के मरीज और 200 नियंत्रण प्रतिभागी थे।
यह अध्ययन University of Queensland, Australiaके Professor Grant W. Montgomery, Professor Gita D. Mishra और Dr Sally Mortlock के सहयोग से किया गया। इस अध्ययन से भारतीय महिलाओं में एंडोमेट्रियोसिस से जुड़े आनुवंशिक जोखिम को समझने के लिए महत्वपूर्ण प्रारंभिक जानकारी मिली है। यह भविष्य में बीमारी के कारणों, आनुवंशिक जोखिम की पहचान, शुरुआती निदान और व्यक्तिगत उपचार से जुड़े शोध के लिए आधार तैयार कर सकता है।
डॉ. निलयकुमार बागड़े, प्रोफेसर, AIIMS रायपुर एवं अध्ययन के सह-लेखक ने कहा, “इस अध्ययन की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसमें भारत के विभिन्न हिस्सों की महिलाओं को शामिल किया गया है, जिसमें ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों की महिलाएं भी शामिल हैं, जो अक्सर आनुवंशिक शोध में कम प्रतिनिधित्व पाती हैं। ऐसे विविध समूहों से प्राप्त शोध-साक्ष्य यह सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण हैं कि भविष्य में होने वाली प्रगति का लाभ देशभर की महिलाओं को समान रूप से मिल सके।”
लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त), कार्यकारी निदेशक एम्स रायपुर ने इस महत्वपूर्ण अध्ययन में शामिल विभाग, सभी फैकल्टी सदस्यों और पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि एम्स रायपुर के लिए यह गर्व की बात है कि वह इस तरह के महत्वपूर्ण शोध अध्ययन का हिस्सा बना है और भारत में महिलाओं के स्वास्थ्य से जुड़े शोध को आगे बढ़ाने में योगदान दे रहा है।}
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