

श्री राजीव गौबा
Raipur chhattisgarh VISHESH / शासन की विफलता का कारण प्रायः नीयत की विफलता नहीं होती है। कोई सब्सिडी उदार हो सकती है, फिर भी उसके क्रियान्वयन में रिसाव की गुंजाइश रह सकती है। कोई विनियमन जनहित की भावना से बनाया गया हो सकता है, लेकिन प्रक्रियागत त्रुटि की आशंका किसी ईमानदार उद्यमी को निर्णय लेने से हतोत्साहित कर सकती है। इसी प्रकार, शिकायत निवारण के लिए पोर्टल उपलब्ध होने के बावजूद किसी नागरिक को यह महसूस हो सकता है कि उसकी शिकायत पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया। इसलिए, महत्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि किसी नीति के पीछे मंशा कितनी अच्छी थी, बल्कि यह भी है कि उसके परिणामस्वरूप व्यवस्था ने व्यवहार में किस प्रकार के परिणाम उत्पन्न किए। वास्तविक कसौटी यह है कि क्या व्यवस्था वांछित व्यवहार को अधिक सरल, पूर्वानुमेय और व्यापक स्तर पर अपनाए जाने योग्य बनाती है।
भारत जैसे विशाल देश में शासन केवल सरकारी कार्यक्रमों के प्रशासन तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्थाओं का निर्माण करना है, जो करोड़ों लोगों तक सेवाओं और योजनाओं को तेज़ी, दक्षता और पूर्वानुमेयता के साथ पहुंचाने में सक्षम हों। यही प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की गुजरात से लेकर केंद्र सरकार तक लगभग 25 वर्षों की शासन-यात्रा का मूल आधार रहा है। इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव अलग-अलग योजनाओं के प्रबंधन से आगे बढ़कर उन व्यवस्थाओं के पुनर्गठन की दिशा में रहा है, जिनके माध्यम से सरकार नागरिकों, व्यवसायों और अधिकारियों के साथ संवाद और सहभागिता करती है। इसका मूल सिद्धांत सरल है—वांछित परिणाम को प्राप्त करना सरल बनाया जाए, उसे मापना आसान हो और व्यापक स्तर पर लागू करना भी सुगम हो।
इस परिवर्तन की प्रक्रिया में प्रौद्योगिकी की केंद्रीय भूमिका रही है। डिजिटल पहचान, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, मानकीकृत प्रक्रियाएं, डैशबोर्ड, रैंकिंग, डिजिटल खरीद प्रणाली, शिकायत निवारण मंच और सार्वजनिक निष्पादन आंकड़ों ने शासन-व्यवस्था का एक नया प्रतिमान स्थापित किया है। इसके माध्यम से सरकार अभूतपूर्व स्तर और गति के साथ सेवाओं एवं कार्यक्रमों का संचालन करने में सक्षम हुई है।
इसका आर्थिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण है।
जेएएम ढांचे—जन धन, आधार और मोबाइल कनेक्टिविटी—ने सरकार और नागरिक के बीच प्रत्यक्ष डिजिटल संपर्क स्थापित किया है। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण के माध्यम से लाभार्थियों के बैंक खातों में 53 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि पहुंचाई गई है। वहीं, डुप्लीकेट, मृत और फर्जी लाभार्थियों को हटाकर सरकारी कोष में अनुमानित 5.14 लाख करोड़ रुपये की बचत हुई है।
2025 में किए गए एक आकलन में पाया गया कि लाभार्थियों की संख्या में 16 गुना विस्तार के बावजूद, कल्याण दक्षता सूचकांक—अर्थात सरकार द्वारा खर्च की गई राशि में से वास्तव में नागरिकों तक पहुंचने वाली राशि का अनुपात—2014 में 0.32 से बढ़कर 2023 में 0.91 हो गया।
पीएम-किसान के तहत 9.49 करोड़ किसानों के बैंक खातों में सीधे 4.47 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि अंतरित की गई है। वहीं, 2.1 करोड़ अपात्र लाभार्थियों को हटाए जाने से अनुमानित 22,106 करोड़ रुपये की बचत हुई। खाद्य वितरण प्रणाली में 5.03 करोड़ से अधिक डुप्लीकेट, फर्जी या अस्तित्वहीन राशन कार्ड हटाए गए, जबकि 80 करोड़ लोगों को प्रत्येक माह नि:शुल्क खाद्यान्न उपलब्ध कराया गया। यह मुद्रास्फीति के अनुरूप समायोजित सार्वभौमिक मूल आय के रूप में वैश्विक स्तर पर अपनी तरह का एक विशिष्ट सहायता है।
इसका उद्देश्य केवल योजनाओं में होने वाले रिसाव को रोकना नहीं है, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं के लाभों की लक्षित, दक्ष और व्यापक स्तर पर प्रभावी पहुंच सुनिश्चित करना है।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के ‘जन भागीदारी’ के सिद्धांत से प्रेरित होकर, नागरिक भी शासन-व्यवस्था में लगातार अधिक सक्रिय भागीदार बने हैं। ‘गिव इट अप’ अभियान के माध्यम से परिवारों को स्वेच्छा से एलपीजी सब्सिडी छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया गया। इस अभियान के तहत 1.13 करोड़ से अधिक उपभोक्ताओं ने स्वेच्छा से सब्सिडी छोड़ने की पहल की, जबकि 4.15 करोड़ डुप्लीकेट, फर्जी, अस्तित्वहीन या निष्क्रिय एलपीजी कनेक्शनों को समाप्त किया गया।
यह दर्शाता है कि नीतियां केवल विनियमन के माध्यम से ही प्रभावी नहीं होतीं, बल्कि विश्वास, पारदर्शिता और नागरिक सहभागिता के माध्यम से भी प्रभावी ढंग से लागू की जा सकती हैं।

यही सिद्धांत आर्थिक विनियमन के क्षेत्र में भी लागू होता है।
किसी उद्यमी के लिए विनियमन की लागत केवल धन तक सीमित नहीं होती। इसमें समय, ध्यान, अनिश्चितता और कई बार आत्मविश्वास भी प्रभावित होता है। अत्यधिक अपराधीकरण के कारण उत्पादक अनुपालन के बजाय रक्षात्मक व्यवहार को बढ़ावा मिल सकता है।
जन विश्वास सुधार इसी समस्या का प्रत्यक्ष समाधान प्रस्तुत करते हैं। जन विश्वास अधिनियम, 2023 के तहत 42 केंद्रीय अधिनियमों के 183 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया। वर्ष 2026 के कानून के तहत इस दिशा में और व्यापक कदम उठाया गया। इसमें 23 मंत्रालयों द्वारा प्रशासित 79 केंद्रीय अधिनियमों के 784 प्रावधानों में संशोधन किया गया। इनमें 717 प्रावधानों और 1,000 से अधिक अपराधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया, जबकि 67 प्रावधानों में संशोधन कर जीवन सुगमता को बढ़ावा दिया गया। यह अधिनियम अप्रैल 2026 में प्रभावी हुआ।
यही सोच नियामकीय अनुपालन बोझ को कम करने की पहल में भी दिखाई देती है। नवंबर 2025 तक 47,000 से अधिक अनुपालनों को कम किया जा चुका था। इनमें 16,108 अनुपालनों को सरल बनाया गया, 22,287 को डिजिटल किया गया, 4,458 को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया और 4,270 अनावश्यक अनुपालनों को समाप्त किया गया।
व्यक्तिगत रूप से देखें तो इनमें से प्रत्येक कमी छोटी लग सकती है। लेकिन लाखों उद्यमों और नागरिकों के संदर्भ में ये छोटे-छोटे बदलाव मिलकर महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ में परिवर्तित हो जाते हैं।
यही सिद्धांत सार्वजनिक खरीद के क्षेत्र में भी दिखाई देता है। जेईएम (गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस) ने खंडित और संबंध-आधारित खरीद व्यवस्था के स्थान पर एक अधिक पारदर्शी डिजिटल बाज़ार व्यवस्था स्थापित की है, जहां खरीदार विभिन्न आपूर्तिकर्ताओं की तुलना कर सकते हैं और विक्रेता सरकारी मांग को देख सकते हैं।
30 जुलाई 2026 तक जेईएम पर 11.75 लाख एमएसएमई, 37,758 स्टार्टअप और 2.17 लाख महिला उद्यमी पंजीकृत थे। वित्त वर्ष 2025-26 में इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से एमएसएमई से की गई खरीद 2.37 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
ये आंकड़े महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि सरकारी मांग तक पहुंच स्वयं औद्योगिक नीति के एक प्रभावी साधन के रूप में कार्य कर सकती है। जब कोई छोटा उद्यम सार्वजनिक क्षेत्र की मांग को देख सकता है और उसमें प्रतिस्पर्धा कर सकता है, तो उसके पास अपनी क्षमता, गुणवत्ता और उत्पादन के परिमाण में निवेश करने के लिए अधिक ठोस कारण होता है।
निष्पादन को भी लगातार अधिक मापनीय बनाया जा रहा है।
वर्ष 2026 में केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली (सीपीग्राम्स) के तहत निर्धारित शिकायत निवारण की समय-सीमा 30 दिनों से घटाकर 21 दिन कर दी गई। 1 जनवरी से 15 जुलाई 2026 के बीच इस प्लेटफॉर्म पर 15.21 लाख शिकायतें प्राप्त हुईं। केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों के लिए शिकायतों के निपटारे में औसतन 13 दिन का समय लगा।
इसका व्यापक सिद्धांत स्पष्ट है—जिसे मापा जा सकता है, उसे बेहतर ढंग से प्रबंधित किया जा सकता है और जिसे देखा जा सकता है, उसमें सुधार किया जा सकता है। यही वर्तमान में हो रहे गहरे शासन-परिवर्तन का आधार है।
किसान को जब सीधे सहायता प्राप्त होती है, तो वह अधिक निश्चितता के साथ अपनी योजनाएं बना सकता है। अनावश्यक अनुपालनों के कम होने से उद्यमी अपना ध्यान व्यवसाय के निर्माण और विस्तार पर केंद्रित कर सकता है। सार्वजनिक मांग तक पहुंच मिलने से एमएसएमई अपनी उत्पादन क्षमता में निवेश कर सकता है। वहीं, शिकायत की स्थिति को ट्रैक कर सकने वाला नागरिक शासन-व्यवस्था के प्रति अधिक विश्वास महसूस कर सकता है।
इन सभी मामलों में शासन व्यवस्था लाभार्थी के व्यवहार को प्रभावित करती है। और जब ऐसा बदलाव लाखों नागरिकों, उद्यमों और अधिकारियों के स्तर पर होता है, तो यह व्यापक आर्थिक लाभ में परिवर्तित होता है।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की शासन-व्यवस्था की अवधारणा से आया व्यापक परिवर्तन राज्य, नागरिक, उद्यमी और अधिकारी के बीच एक अधिक सुविचारित और उद्देश्यपूर्ण संवाद-तंत्र का निर्माण है। यह नई व्यवस्था ‘नागरिक पर विश्वास’ अर्थात ‘जन विश्वास’ के सिद्धांत पर आधारित है, जिसे प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने ‘विकसित भारत’ के लिए शासन के नए प्रतिमान के रूप में परिभाषित किया है।
भारत के विशाल आकार को कभी मुख्यतः एक प्रशासनिक चुनौती के रूप में देखा जाता था। उभरती हुई शासन-व्यवस्था एक अलग संभावना प्रस्तुत करती है—जब साझा डिजिटल और संस्थागत व्यवस्थाएं सेवाओं, बाजारों और अवसरों को अधिक दक्षता के साथ लोगों तक पहुंचाने में सक्षम हों, तो देश का विशाल आकार एक चुनौती के बजाय एक लाभ में परिवर्तित हो सकता है।
भारत के विकास के अगले चरण की दिशा पूंजी, अवसंरचना, कौशल, प्रौद्योगिकी और उद्यमिता जैसे कारकों पर निर्भर करेगी। लेकिन इन सभी शक्तियों को किस प्रकार और कितनी प्रभावशीलता से एक साथ लाया जाता है, यह शासन-व्यवस्था पर निर्भर करता है।
इसीलिए, शासन-व्यवस्था का मोदी मॉडल अब केवल एक प्रशासनिक कार्य तक सीमित नहीं रह गया है। यह एक आर्थिक परिसंपत्ति के रूप में उभर रहा है और विकसित अर्थव्यवस्था की दिशा में आगे बढ़ते भारत के लिए संभावित रूप से सबसे महत्वपूर्ण प्रतिस्पर्धात्मक लाभों में से एक बन सकता है।
(लेखक नीति आयोग के सदस्य और भारत सरकार के पूर्व कैबिनेट सचिव हैं।)
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