





Raipur chhattisgarh VISHESH / राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) रायपुर द्वारा दिव्यांगजनों हेतु दो दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य दिव्यांगजनों को उनके अधिकारों, सरकारी योजनाओं, रोजगार, कौशल विकास तथा आत्मनिर्भरता के अवसरों से परिचित कराना तथा समाज के निर्माण को प्रोत्साहित करना है। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि एनआईटी रायपुर के निदेशक डॉ. एन. वी. रमना राव रहे। विशिष्ट अतिथि के रूप में राष्ट्रीय करियर सेवा केंद्र (दिव्यांगजन) के सहायक निदेशक (रोजगार) डॉ. सुरेश कुमार कुशवाहा उपस्थित रहे। इस समारोह में कुलसचिव, एनआईटी रायपुर, डॉ. नरेंद्र डी. लोंढे; श्री बंसीलाल, श्री अंकेश पाठक; श्रीमती शिखा वर्मा; तथा श्री राजेश तिवारी शामिल रहे। इस कायर्क्रम का समन्वयन डॉ. नरेंद्र डी. लोंढे, कुलसचिव, एनआईटी रायपुर; डॉ. बुनिल कुमार बलबंतराय, सहायक प्राध्यापक, कंप्यूटर विज्ञान एवं अभियांत्रिकी विभाग; तथा डॉ. सत्या ईश्वरी जुज्जावरापु, सह-प्राध्यापक, जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा किया जा रहा है।
अतिथियों के औपचारिक स्वागत के उपरांत, डॉ. बुनिल कुमार बलबंतराय ने स्वागत भाषण प्रस्तुत किया। उन्होंने मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि तथा कार्यक्रम में उपस्थित सभी सम्माननीय गणमान्य व्यक्तियों का हार्दिक स्वागत किया। साथ ही, उन्होंने कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक सहभागिता करने वाले सभी प्रतिभागियों के प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त की।
अपने संबोधन में डॉ. बलबंतराय ने दिव्यांगजनों के लिए समावेशिता, गरिमा एवं समान अवसरों के महत्व पर विशेष बल दिया।

उन्होंने कहा, “हाँ, मैं दिव्यांग हूँ, यह सत्य है; लेकिन इसका वास्तविक अर्थ केवल इतना है कि मुझे आपके मुकाबले जीवन में थोड़ा अलग मार्ग अपनाना पड़ सकता है।” इस कथन के माध्यम से उन्होंने स्पष्ट किया कि दिव्यांगता को कभी भी किसी की सीमा या कमजोरी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे जीवन जीने के एक भिन्न तरीके के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
उन्होंने आगे रॉबर्ट एम. हेंसल का यह प्रेरणादायक कथन उद्धृत किया: “समाज में सबसे बड़ी दिव्यांगता किसी व्यक्ति को उसके वास्तविक व्यक्तित्व और क्षमता से बढ़कर देखने में असमर्थ होना है।” इसके माध्यम से उन्होंने सभी से आग्रह किया कि वे प्रत्येक व्यक्ति की शारीरिक या सामाजिक सीमाओं से परे उसकी प्रतिभा, क्षमता और संभावनाओं को पहचानें।
अपने संदेश के समापन पर उन्होंने अल्बर्ट आइंस्टीन से प्रचलित रूप से संबद्ध प्रसिद्ध उद्धरण साझा किया: “हर व्यक्ति प्रतिभाशाली होता है, लेकिन यदि आप किसी मछली का मूल्यांकन उसके पेड़ पर चढ़ने की क्षमता से करेंगे, तो वह अपना पूरा जीवन स्वयं को मूर्ख समझते हुए बिताएगी।”
इसके पश्चात्, डॉ. नरेंद्र डी. लोंढे ने उद्घाटन संबोधन प्रस्तुत किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने दिव्यांगजनों के लिए आयोजित किए जा रहे जागरूकता कार्यक्रमों एवं विभिन्न पहलों की निरंतर बढ़ती संख्या की सराहना की। उन्होंने ऐसे सार्थक प्रयासों के लिए निदेशक महोदय के निरंतर सहयोग के प्रति आभार व्यक्त किया तथा कार्यक्रम में उपस्थित विशेष रूप से दिव्यांग बच्चों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनंदन किया।
डॉ. कुशवाहा ने अपने उद्बोधन में कहा कि किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण में उसका परिवेश और संगति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि एनआईटी रायपुर जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में उपस्थित होना उनके लिए गौरव का विषय है। उन्होंने दिव्यांगजनों की विशेष प्रतिभाओं को उनकी हीरे जैसी गुणवत्ता बताते हुए सभी प्रतिभागियों से अपनी विशिष्ट क्षमताओं को पहचानने और उन्हें समाज के विकास में उपयोग करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि समाज में दिव्यांगजनों के प्रति सोच निरंतर सकारात्मक हो रही है तथा अब दृष्टिकोण दान से आगे बढ़कर संवेदनशीलता और अधिकार आधारित हो रहा है।
इसके पश्चात डॉ. राव ने बताया कि एनआईटी रायपुर दिव्यांगजनों के अधिकारों और आवश्यकताओं के प्रति पूरी तरह सजग है तथा संस्थान में उनकी सुविधा हेतु आवश्यक संरचना और व्यवस्थाएँ विकसित की गई हैं। उन्होंने बताया कि वर्कशॉप का मूल विषय इम्पाउअरींग एबिलिटीज़ है जो कि एक सराहनीय पहल है ।
उद्घाटन समारोह के अंत में डॉ. सत्या ईश्वरी जुज्जावरापु ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए निदेशक महोदय, विशिष्ट अतिथियों, सभी संसाधन व्यक्तियों, सहयोगी संस्थाओं, प्रतिभागियों एवं आयोजन समिति के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया
कार्यक्रम के पहले सत्र में डॉ. एन. वी. रमना राव ने दिव्यांगता के मेडिकल मॉडल और सोशल मॉडल के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए बताया गया कि अनेक बार समस्या व्यक्ति में नहीं बल्कि समाज एवं उसके परिवेश में मौजूद बाधाओं के कारण उत्पन्न होती है। उदाहरण के माध्यम से समझाया गया कि यदि किसी भवन में केवल सीढ़ियाँ हों और रैंप उपलब्ध न हो, तो वास्तविक बाधा व्यक्ति की शारीरिक स्थिति नहीं बल्कि अनुपयुक्त संरचना है।
सत्र में संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगजन अधिकार अभिसमय (सीआरपीडी) को दिव्यांग अधिकारों का वैश्विक मानक बताते हुए इसके प्रमुख सिद्धांत नॉन-डिस्क्रिमिनेशन, एक्सेसिबिलिटी, इनक्लुज़न तथा ऑटोनोमी पर विस्तार से चर्चा की गई, साथ ही उन्होंने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (आरपीडब्ल्यूडी एक्ट, 2016) के प्रावधानों, 21 प्रकार की दिव्यांगताओं की मान्यता, रोजगार एवं शिक्षा के अधिकार, समुदाय में स्वतंत्र जीवन, उचित सुविधाओं तथा कानून के प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया। डॉ. राव ने यह भी बताया कि भारत में दिव्यांगजनों के प्रति दृष्टिकोण अब दान आधारित व्यवस्था से अधिकार आधारित व्यवस्था की ओर विकसित हो चुका है। उन्होंने सरकारी योजनाओं, दिव्यांगजनों द्वारा निर्मित उत्पादों की बढ़ती स्वीकार्यता तथा सरकारी नौकरियों में आरक्षण को 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 4 प्रतिशत किए जाने जैसी महत्वपूर्ण पहलों का भी उल्लेख किया।
एनआईटी रायपुर का यह दो दिवसीय जागरूकता कार्यक्रम दिव्यांगजनों के अधिकारों, समान अवसरों, कौशल विकास, आत्मनिर्भरता तथा समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं प्रेरणादायी पहल के रूप में स्थापित होगा।





















