

प्रविष्टि तिथि: 25 SEP 2026 7:37PM
छत्तीसगढ़ के कई हिस्सों में धान की फसल अब बालियां निकलने की शुरुआत यानी पैनिकल इनिशिएशन और प्रारंभिक प्रजनन अवस्था में पहुंच गई है। फसल की इस निर्णायक अवस्था में होने वाला प्रबंधन सीधे बालियों के विकास, दाना बनने और अंतिम उत्पादन को प्रभावित करता है। लगातार बारिश और अधिक आर्द्रता को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान, रायपुर ने किसानों को खेतों की नियमित निगरानी बढ़ाने तथा कीट एवं रोग नियंत्रण के लिए आवश्यकता-आधारित और वैज्ञानिक प्रबंधन उपाय अपनाने की सलाह दी है।

पैनिकल इनिशिएशन धान के पौधे के वानस्पतिक विकास से प्रजनन विकास की ओर संक्रमण का महत्वपूर्ण चरण है। इसी दौरान पौधे के ऊपरी हिस्से में बालियों का विकास शुरू होता है। इस अवस्था में खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखना आवश्यक है, जबकि जहां पानी का जमाव हो रहा हो वहां उचित जल निकासी सुनिश्चित करने पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान के निदेशक डॉ. पी. के. राय ने कहा, “धान में पैनिकल इनिशिएशन फसल सुरक्षा की दृष्टि से निर्णायक समय है। इन कुछ सप्ताहों के दौरान किया गया प्रबंधन बालियों के विकास, दाना बनने और उत्पादकता को सीधे प्रभावित कर सकता है। किसानों को संतुलित पोषण और पर्याप्त नमी बनाए रखने के साथ खेतों का नियमित निरीक्षण करना चाहिए तथा बिना आवश्यकता के कृषि रसायनों के इस्तेमाल से बचना चाहिए।”
किसानों को प्रजनन अवस्था के दौरान पीला तना छेदक (येलो स्टेम बोरर) और भूरा माहू (ब्राउन प्लांट हॉपर) की विशेष निगरानी करने की सलाह दी गई है। तना छेदक के प्रकोप से सफेद बालियां दिखाई दे सकती हैं, जबकि पौधे के निचले हिस्से में भूरा माहू के प्रकोप से गोलाकार रूप में फसल सूखने की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जिसे “हॉपर बर्न” कहा जाता है। नियमित खेत निरीक्षण तथा आवश्यकता के अनुसार फेरोमोन ट्रैप का उपयोग कीटों की शुरुआती पहचान और समय पर प्रबंधन में सहायक हो सकता है।
संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने रोगों की समय पर पहचान की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा, “लंबे समय तक बनी रहने वाली आर्द्र परिस्थितियों और घनी फसल में शीथ ब्लाइट तथा ब्लास्ट जैसे रोग तेजी से फैल सकते हैं। लक्षणों की शुरुआती पहचान और समय पर, आवश्यकता-आधारित हस्तक्षेप से फसल में होने वाले अनावश्यक नुकसान को कम किया जा सकता है।”
शीथ ब्लाइट सामान्यतः पत्ती के आवरण पर अंडाकार या अनियमित धब्बों के रूप में दिखाई देता है, जबकि ब्लास्ट पत्तियों, गांठों और कॉलर को प्रभावित कर सकता है तथा बाद में गर्दन और बाली तक नुकसान पहुंचा सकता है। किसानों को सलाह दी गई है कि रोग के लक्षणों की उचित पहचान और खेत की स्थिति के आकलन के बाद ही उपयुक्त रोग प्रबंधन उपाय अपनाएं।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान के वैज्ञानिकों ने किसानों से केवल अनुशंसित कीटनाशकों और फफूंदनाशकों का इस्तेमाल करने तथा उन्हें स्वीकृत लेबल निर्देशों और निर्धारित मात्रा के अनुसार ही प्रयोग करने को कहा है। नाइट्रोजन का अत्यधिक प्रयोग, अनावश्यक रूप से विभिन्न कीटनाशकों का मिश्रण और एक ही रसायन या रासायनिक समूह का बार-बार इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
वैज्ञानिकों के अनुसार, इस महत्वपूर्ण अवस्था में नियमित खेत निगरानी, संतुलित पोषण, विवेकपूर्ण जल प्रबंधन तथा समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन अपनाकर धान की फसल को संभावित कीट एवं रोग प्रकोप से बचाया जा सकता है और उसकी उत्पादन क्षमता को बनाए रखा जा सकता है।





















