

नीलगिरी की पत्तियों से विकसित हरित उत्प्रेरक के माध्यम से अपशिष्ट पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET) बोतलों का पुनर्चक्रण; भविष्य की त्रि-आयामी (3D) प्रिंटिंग के लिए भी संभावनाएं
नई सामग्री को बार-बार नया आकार दिया जा सकता है, मरम्मत एवं पुनः उपयोग संभव; परिपत्र अर्थव्यवस्था और सतत विनिर्माण को मिलेगा बढ़ावा
प्रविष्टि तिथि: 03 AUG 2026 6:47PM by PIB Raipur
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (Indian Institute of Technology-IIT) भिलाई के शोधकर्ताओं ने अपशिष्ट पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (Polyethylene Terephthalate-PET) प्लास्टिक को उच्च-मूल्य वाली पुनः उपयोग योग्य इंजीनियरिंग सामग्री में परिवर्तित करने की एक अभिनव तकनीक विकसित की है। इस तकनीक से तैयार सामग्री को बार-बार नया आकार दिया जा सकता है, आवश्यकता पड़ने पर उसकी मरम्मत की जा सकती है तथा पुनः संसाधित कर दोबारा उपयोग में लाया जा सकता है। यह उपलब्धि प्लास्टिक प्रदूषण में कमी लाने, सतत विनिर्माण को बढ़ावा देने तथा परिपत्र अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


यह शोध भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान भिलाई के रसायन विज्ञान विभाग के डॉ. संजीब बनर्जी के नेतृत्व में प्रियंक सिन्हा, भरतभूषण मेश्राम तथा ओंकारनाथ वर्मा द्वारा किया गया। शोध के निष्कर्ष प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका “Materials Today Catalysis” में प्रकाशित हुए हैं। इस तकनीक के लिए शोधकर्ताओं ने भारतीय पेटेंट के लिए भी आवेदन किया है।

पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET) बोतलें विश्व में पेय पदार्थों और खाद्य पैकेजिंग में सबसे अधिक उपयोग होने वाले प्लास्टिक उत्पादों में शामिल हैं। इनके उपयोग से प्रतिवर्ष बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है। पारंपरिक पुनर्चक्रण प्रक्रियाओं में प्लास्टिक की गुणवत्ता धीरे-धीरे घटती जाती है, जिससे उसका पुनः उपयोग सीमित हो जाता है। इसी चुनौती का समाधान प्रस्तुत करते हुए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान भिलाई के शोधकर्ताओं ने नीलगिरी की पत्तियों से एक हरित एवं पुनः उपयोग योग्य उत्प्रेरक विकसित किया है, जो अपशिष्ट पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET) बोतलों को मूल्यवान रासायनिक निर्माण खंड (Chemical Building Block) में परिवर्तित करता है। इस उत्प्रेरक को चुंबक की सहायता से आसानी से अलग कर कई बार पुनः उपयोग किया जा सकता है, जिससे पुनर्चक्रण प्रक्रिया अधिक स्वच्छ, किफायती और पर्यावरण-अनुकूल बनती है।
शोधकर्ताओं ने इस रासायनिक निर्माण खंड को आगे एक उच्च-प्रदर्शन, पुनः संसाधित एवं गतिशील पॉलिमर में परिवर्तित किया है, जिसे भविष्य में त्रि-आयामी (Three-Dimensional-3D) प्रिंटिंग तथा एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग जैसी उन्नत विनिर्माण तकनीकों में उपयोग किए जाने की संभावना है। गर्म करने पर यह सामग्री आसानी से मनचाहे आकार में ढल जाती है तथा ठंडा होने पर उसी आकार को स्थायी रूप से बनाए रखती है। परीक्षणों में इसे कई बार अलग-अलग आकृतियों में ढाला गया, लेकिन इसके गुणों में कोई उल्लेखनीय कमी नहीं आई। यही विशेषता इसे मरम्मत योग्य, पुनः उपयोग योग्य तथा दीर्घकालिक उपयोग के लिए उपयुक्त बनाती है।
डॉ. संजीब बनर्जी के अनुसार वर्तमान में व्यापक रूप से उपयोग किए जाने वाले अधिकांश थर्मोसेट प्लास्टिक मजबूत और टिकाऊ तो होते हैं, लेकिन एक बार तैयार हो जाने के बाद उन्हें दोबारा आकार नहीं दिया जा सकता और न ही प्रभावी ढंग से पुनर्चक्रित किया जा सकता है। इससे बड़ी मात्रा में प्लास्टिक अपशिष्ट उत्पन्न होता है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान भिलाई द्वारा विकसित नई सामग्री मजबूती और पुनः उपयोग की क्षमता दोनों को एक साथ उपलब्ध कराती है तथा यह सिद्ध करती है कि अपशिष्ट पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET) बोतलों को लैंडफिल में भेजने के बजाय उच्च-मूल्य वाली इंजीनियरिंग सामग्री में परिवर्तित किया जा सकता है।
यह तकनीक अनुकूलित प्लास्टिक उत्पादों, पुनः उपयोग योग्य उपभोक्ता वस्तुओं, शैक्षणिक मॉडल तथा इंजीनियरिंग प्रोटोटाइप के निर्माण में उपयोगी सिद्ध हो सकती है। साथ ही, भविष्य में त्रि-आयामी (3D) प्रिंटिंग के लिए संभावित सामग्री के रूप में इसका उपयोग कम सामग्री अपशिष्ट के साथ अधिक टिकाऊ उत्पादन को बढ़ावा दे सकता है।
यह नवाचार भारत सरकार की स्वच्छ भारत मिशन, आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया तथा राष्ट्रीय संसाधन दक्षता नीति (National Resource Efficiency Policy) के उद्देश्यों के अनुरूप प्लास्टिक प्रदूषण में कमी, संसाधनों के अधिक कुशल उपयोग तथा स्वच्छ एवं टिकाऊ विनिर्माण प्रणाली को बढ़ावा देने की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। अपशिष्ट पॉलीएथिलीन टेरेफ्थेलेट (PET) बोतलों को उच्च-मूल्य वाली पुनः उपयोग योग्य सामग्री में परिवर्तित करने वाली यह तकनीक नए प्लास्टिक पर निर्भरता कम करने और “वेस्ट-टू-वेल्थ” की अवधारणा को व्यवहारिक रूप देने की दिशा में एक उल्लेखनीय उपलब्धि मानी जा रही है।





















