

पर्याप्त वर्षा मिलते ही रोपाई पूरी करें, अधिक देरी होने पर कम अवधि वाली धान किस्में एवं वैकल्पिक फसलों को अपनाने की सलाह


मानसूनी बारिश के बीच धान की रोपाई में जुटे किसान खरीफ सीजन की शुरुआत पूरे उत्साह के साथ कर रहे हैं। भरपूर एवं समृद्ध फसल की उम्मीद के साथ किसान खेती की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया को गति दे रहे हैं। खरीफ सीजन की रौनक गांवों में लौट आई है।* *(फोटो: आईसीएआर–एनआईबीएसएम)
Raipur chhattisgarh VISHESH / दक्षिण-पश्चिम मानसून में विलंब तथा छत्तीसगढ़ के अनेक क्षेत्रों में वर्षा की अनिश्चितता के मद्देनजर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान (आईसीएआर–एनआईबीएसएम), रायपुर ने प्रदेश के धान किसानों के लिए विशेष वैज्ञानिक कृषि परामर्श जारी किया है। संस्थान ने खरीफ मौसम में फसल की सफल स्थापना सुनिश्चित करने तथा संभावित उत्पादन हानि को न्यूनतम रखने के लिए किसानों से मौसम की स्थिति के अनुरूप समयबद्ध वैज्ञानिक एवं आकस्मिक कृषि प्रबंधन उपाय अपनाने का आग्रह किया है।


| भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान (आईसीएआर–एनआईबीएसएम), रायपुर के प्रक्षेत्र में धान की ‘देवभोग’ किस्म की पौध रोपाई के लिए तैयार |
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संस्थान के अनुसार, पर्याप्त वर्षा होने पर किसान 20 से 25 दिन पुराने स्वस्थ पौधों की अनुशंसित दूरी पर शीघ्र रोपाई पूरी करें। यदि रोपाई में अधिक विलंब हो, तो कम से मध्यम अवधि में पकने वाली धान की किस्मों का चयन किया जाए। जिन क्षेत्रों में रोपाई संभव न हो, वहां अंकुरित बीजों का उपयोग करते हुए ड्रम सीडर अथवा छिड़काव विधि से धान की सीधी बुवाई की जा सकती है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान के निदेशक डॉ. पी.के. राय ने कहा कि बदलती जलवायु और अनिश्चित वर्षा की परिस्थितियों में समय पर वैज्ञानिक फसल प्रबंधन तथा आकस्मिक कृषि योजना अपनाना अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने किसानों से स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप कृषि विज्ञान केंद्रों तथा कृषि विशेषज्ञों के नियमित संपर्क में रहकर वैज्ञानिक सलाह का पालन करने की अपील की।
संस्थान ने संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन पर विशेष बल देते हुए फास्फोरस एवं पोटाश की अनुशंसित मात्रा आधार खाद के रूप में देने तथा नत्रजन उर्वरक का प्रयोग फसल की आवश्यकता के अनुसार विभाजित मात्रा में करने की सलाह दी है। साथ ही भारी वर्षा की संभावना से ठीक पहले यूरिया का प्रयोग नहीं करने की अनुशंसा की गई है, ताकि पोषक तत्वों के बहाव से होने वाली हानि को रोका जा सके।
किसानों को समय पर खरपतवार नियंत्रण, खेत में पर्याप्त नमी बनाए रखने तथा जलभराव की स्थिति में प्रभावी जल निकासी सुनिश्चित करने की सलाह भी दी गई है। इसके साथ ही तना छेदक, पत्ती लपेटक जैसे प्रमुख कीटों तथा ब्लास्ट एवं जीवाणुजनित पत्ती झुलसा जैसे रोगों की नियमित निगरानी करते हुए आवश्यकता के अनुसार वैज्ञानिक अनुशंसाओं पर आधारित पौध संरक्षण उपाय अपनाने पर जोर दिया गया है।
संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने कहा कि विलंबित मानसून की स्थिति में फसल की प्रारंभिक अवस्था सबसे अधिक महत्वपूर्ण होती है। किसानों को खेत संबंधी कार्यों में अनावश्यक विलंब से बचते हुए संतुलित पोषण, प्रभावी खरपतवार नियंत्रण तथा कीट एवं रोगों की नियमित निगरानी सुनिश्चित करनी चाहिए।
संस्थान ने यह भी सलाह दी है कि जिन क्षेत्रों में लंबे समय तक वर्षा का अभाव बना रहने से धान की खेती प्रभावित होने की आशंका है, वहां स्थानीय कृषि-जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप मक्का, अरहर, उड़द, मूंग, तिल तथा मोटे अनाज जैसी वैकल्पिक फसलों की खेती पर विचार किया जा सकता है। संस्थान ने किसानों से मौसम आधारित कृषि परामर्श और वैज्ञानिक अनुशंसाओं का पालन कर खरीफ फसलों को सुरक्षित एवं उत्पादक बनाने की अपील की है।





















