
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा है कि 1947 के विभाजन के बाद भारत आने वाले लोग शरणार्थी नहीं थे, बल्कि “संघर्ष के योद्धा” थे. जिन्होंने ‘मातृभूमि’ और ‘धर्म’ के प्रति प्रेम के कारण अपार कष्ट और पीड़ा सहते हुए भारत आने का फ़ैसला किया.
मोहन भागवत ने कहा, इन लोगों ने नवगठित पाकिस्तान में अपनी कई पीढ़ियों की कमाई हुई संपत्ति, ज़मीन-जायदाद और कारोबार छोड़ दिए और भारत आना स्वीकार किया.

भागवत ने बुधवार को नागपुर में सिंधी समाज की ओर से संचालित सिंधु एजुकेशन सोसाइटी के 75वें स्थापना दिवस समारोह में ये बातें कहीं. भागवत ने कहा, विभाजन के बाद लोगों ने पूरी चेतना के साथ भारत आने का निर्णय लिया क्योंकि वे भारतभूमि में रहना चाहते थे,जहां वे बिना किसी भय के अपने धर्म का पालन कर सकें. वे विस्थापित ज़रूर थे, लेकिन शरणार्थी नहीं थे. उस समय उनके लिए ‘शरणार्थी’ शब्द का इस्तेमाल करना ग़लत था. वे मातृभूमि और अपने धर्म के प्रति प्रेम से संघर्ष करने वाले योद्धा थे.
उन्होंने कहा भारत को एकजुट रखने की लड़ाई हम सब हार गए. यह केवल उनकी ग़लती नहीं थी और उन्होंने न तो करियर चुना और न ही संपत्ति. उन्होंने अपने देश और अपने धर्म को चुना l





















