
प्रविष्टि तिथि: 02 JUL 2026 6:19PM by PIB Raipur
खरीफ मौसम की तैयारियों को वैज्ञानिक आधार प्रदान करने तथा किसानों को जलवायु परिवर्तन और फसल संबंधी चुनौतियों के प्रति अधिक सक्षम बनाने के उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर)–राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान (एनआईबीएसएम), रायपुर द्वारा जून 2026 के दौरान रायपुर जिले में एक माह तक व्यापक ‘खेत बचाओ अभियान’ सफलतापूर्वक संचालित किया गया। इस अभियान के तहत वैज्ञानिकों ने गांव-गांव पहुंचकर किसानों को अनुसंधान आधारित कृषि तकनीकों, फसल संरक्षण उपायों तथा जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों की जानकारी दी, जिससे खरीफ सीजन से पहले किसानों को वैज्ञानिक मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा सके।

अभियान के अंतर्गत रायपुर जिले के तिल्दा, धरसीवां और आरंग विकासखंडों के अनेक गांवों में सुनियोजित जागरूकता एवं क्षमता संवर्धन कार्यक्रम आयोजित किए गए। मानसून आधारित खेती को ध्यान में रखते हुए संचालित इस विशेष अभियान में किसानों, कृषि हितधारकों तथा स्थानीय जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। इससे वैज्ञानिक कृषि तकनीकों के प्रति किसानों का विश्वास और अनुसंधान संस्थानों के साथ उनका जुड़ाव और अधिक मजबूत हुआ।
पूरे अभियान के दौरान 36 ग्राम स्तरीय जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन किया गया, जिनसे 1,720 किसानों एवं कृषि हितधारकों को प्रत्यक्ष रूप से लाभ मिला। इनमें 1,010 पुरुष तथा 710 महिला प्रतिभागी शामिल रहे। महिला किसानों की उल्लेखनीय भागीदारी ने कृषि कार्यों एवं निर्णय प्रक्रिया में उनकी बढ़ती भूमिका को भी रेखांकित किया। कार्यक्रमों में स्थानीय जनप्रतिनिधियों एवं सामुदायिक नेतृत्व की सक्रिय सहभागिता से वैज्ञानिक संदेशों का व्यापक प्रसार सुनिश्चित हुआ तथा कृषि अनुसंधान संस्थानों और ग्रामीण समुदायों के बीच सहयोग को नई मजबूती मिली।
बदलती जलवायु, मानसून की अनिश्चितता तथा कीट एवं रोगों के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए अभियान का मुख्य उद्देश्य किसानों को वैज्ञानिक जानकारी से सशक्त बनाना था, ताकि वे उत्पादन संबंधी जोखिमों को कम कर सकें और फसलों की उत्पादकता एवं स्थिरता बढ़ा सकें। इस दौरान संस्थान के वैज्ञानिकों ने समेकित कीट प्रबंधन (इंटीग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट), फसली रोगों की प्रारंभिक पहचान एवं वैज्ञानिक प्रबंधन, जैविक तनावों की समय पर पहचान, मृदा स्वास्थ्य के आधार पर संतुलित एवं आवश्यकता आधारित उर्वरक प्रबंधन तथा पोषक तत्वों के वैज्ञानिक उपयोग पर विस्तार से जानकारी दी।
अभियान के दौरान किसानों को जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों, जल संरक्षण आधारित खेती तथा दक्षिण-पश्चिम मानसून के संभावित विलंब को देखते हुए वैकल्पिक फसल एवं आकस्मिक फसल योजना (कॉन्टिन्जेंसी प्लानिंग) अपनाने के संबंध में भी विस्तार से मार्गदर्शन दिया गया। वैज्ञानिकों ने बताया कि समय पर फसल प्रबंधन, समेकित कृषि पद्धतियों तथा निवारक पौध संरक्षण उपायों को अपनाकर किसान कीट एवं रोगों से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम कर सकते हैं और उत्पादन में स्थिरता बनाए रख सकते हैं।
कार्यक्रमों के दौरान किसानों ने वैज्ञानिकों के साथ सीधे संवाद करते हुए फसल सुरक्षा, पोषक तत्वों की कमी, रोग प्रबंधन तथा मौसमी कृषि संबंधी विभिन्न समस्याओं पर चर्चा की। वैज्ञानिकों ने स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप अनुसंधान आधारित समाधान उपलब्ध कराए, जिससे किसानों में आधुनिक एवं वैज्ञानिक कृषि तकनीकों को अपनाने के प्रति विश्वास और उत्साह बढ़ा।
अभियान के अंतर्गत संस्थान परिसर में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) कार्यक्रम के अवसर पर एक विशेष किसान जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किया गया, जिसमें 220 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया। यह कार्यक्रम किसानों और वैज्ञानिकों के बीच प्रत्यक्ष संवाद का प्रभावी मंच साबित हुआ। इसमें किसानों को उन्नत कृषि तकनीकों, नवीन अनुसंधान उपलब्धियों तथा टिकाऊ कृषि को प्रोत्साहित करने वाली विभिन्न सरकारी पहलों की जानकारी दी गई। साथ ही स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप नवाचार आधारित कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए भी किसानों को प्रेरित किया गया।
मैदानी स्तर पर अभियान का संचालन संस्थान की वैज्ञानिक डॉ. प्रियंका मीणा एवं डॉ. के. सी. शर्मा ने किया। दोनों वैज्ञानिकों ने विभिन्न गांवों का दौरा कर किसानों से व्यापक संवाद किया तथा समेकित फसल संरक्षण, संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन और जलवायु-अनुकूल कृषि पद्धतियों के संबंध में व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रदान किया। इन भ्रमणों के माध्यम से वैज्ञानिकों को क्षेत्र विशेष की कृषि संबंधी चुनौतियों को समझने तथा स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप सलाह उपलब्ध कराने का अवसर भी मिला।
इस अभियान का समन्वय भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान, रायपुर के संयुक्त निदेशक डॉ. ए. अमरेंद्र रेड्डी ने नोडल अधिकारी के रूप में किया। यह अभियान संस्थान के निदेशक डॉ. पी. के. राय के समग्र मार्गदर्शन में संचालित किया गया। यह पहल अनुसंधान एवं खेत के बीच की दूरी को कम करते हुए वैज्ञानिक तकनीकों को सीधे किसानों तक पहुंचाने की संस्थान की सतत विस्तार गतिविधियों का महत्वपूर्ण हिस्सा रही।
अभियान की सफलता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए डॉ. पी. के. राय ने वैज्ञानिक दल के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहा कि अनुसंधान आधारित कृषि तकनीकों का समय पर किसानों तक पहुंचना कृषि उत्पादकता बढ़ाने, जलवायु जनित चुनौतियों से निपटने तथा टिकाऊ कृषि व्यवस्था को मजबूत करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने दोहराया कि वैज्ञानिकों और किसानों के बीच प्रत्यक्ष संवाद को सशक्त बनाना संस्थान की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल है तथा भविष्य में भी इस प्रकार के व्यापक मैदानी कार्यक्रमों के माध्यम से वैज्ञानिक कृषि, तकनीकी हस्तांतरण और किसान-केंद्रित विस्तार गतिविधियों को निरंतर बढ़ावा दिया जाता रहेगा।
एक माह तक चले ‘खेत बचाओ अभियान’ की सफलता यह दर्शाती है कि अनुसंधान, कृषि विस्तार सेवाओं और सामुदायिक सहभागिता के समन्वित प्रयास किसानों को समय पर वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराने का प्रभावी माध्यम बन रहे हैं। इस अभियान ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान, रायपुर की उस प्रतिबद्धता को भी पुनः रेखांकित किया है, जिसके तहत संस्थान टिकाऊ कृषि विकास को बढ़ावा देने, अनुसंधान आधारित तकनीकों को खेत तक पहुंचाने तथा किसानों को बदलती कृषि एवं जलवायु संबंधी चुनौतियों का आत्मविश्वास के साथ सामना करने में सक्षम बनाने के लिए निरंतर कार्य कर रहा है।





















