

Raipur chhattisgarh VISHESH / भारत में जल संकट केवल संसाधनों की कमी का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि यह कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जलवायु अनुकूलन और सतत विकास से जुड़ी एक गंभीर चुनौती बन चुका है। बढ़ती जनसंख्या, असमान वर्षा वितरण, भूजल दोहन और जलवायु परिवर्तन ने ग्रामीण क्षेत्रों में जल प्रबंधन को और अधिक जटिल बना दिया है। ऐसे समय में “जल बजटिंग” एक प्रभावी और सहभागी समाधान के रूप में उभरकर सामने आई है, जो समुदायों को जल संसाधनों के वैज्ञानिक और संतुलित उपयोग के लिए सक्षम बना रही है।
जल शक्ति मंत्रालय और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा संचालित पहलें यह दर्शाती हैं कि यदि स्थानीय समुदायों को जल प्रबंधन में सहभागी बनाया जाए तो जल संकट का दीर्घकालिक समाधान संभव है। अटल भूजल योजना, राष्ट्रीय जल मिशन, जलयुक्त शिवर अभियान और राजस्थान का मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान इसके सफल उदाहरण हैं।

जल संसाधनों पर बढ़ता दबाव
केंद्रीय जल आयोग के अध्ययन के अनुसार भारत में औसतन प्रतिवर्ष लगभग 3880 अरब घन मीटर वर्षा होती है। प्राकृतिक क्षति और वाष्पीकरण के बाद देश में औसत वार्षिक जल उपलब्धता लगभग 1999 अरब घन मीटर आंकी गई है। हालांकि, बढ़ती आबादी के कारण प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता लगातार घट रही है।
विश्व की लगभग 17.5 प्रतिशत आबादी और 11.6 प्रतिशत पशुधन भारत में है, जबकि जल संसाधन सीमित हैं। ग्रामीण भारत में उपलब्ध जल का लगभग 80 से 90 प्रतिशत हिस्सा कृषि में उपयोग होता है। ऐसे में भूजल स्तर में गिरावट और जल संकट की स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है।
क्या है जल बजटिंग
जल बजटिंग का अर्थ किसी गांव, ब्लॉक, जलग्रहण क्षेत्र या जिले में उपलब्ध जल और उसकी मांग का वैज्ञानिक आकलन करना है। इसमें वर्षा, भूजल पुनर्भरण, सतही जल, बहाव, वाष्पीकरण और विभिन्न उपयोगों की जल मांग को शामिल किया जाता है।
यह प्रक्रिया केवल गणना तक सीमित नहीं है, बल्कि जल के स्रोतों, मौसमी बदलावों और मानव गतिविधियों के प्रभाव को समझने का माध्यम भी है। इसके आधार पर कृषि, घरेलू उपयोग, पशुपालन और अन्य गतिविधियों के लिए संतुलित जल आवंटन संभव हो पाता है।
कृषि और पशुपालन में सहायक
राष्ट्रीय एकीकृत जल संसाधन विकास आयोग के अनुसार वर्ष 2050 तक सिंचाई के लिए पानी की मांग 807 बिलियन क्यूबिक मीटर तक पहुंच सकती है। ऐसे में जल बजटिंग किसानों को स्थानीय जल उपलब्धता के अनुरूप फसल चयन और सिंचाई पद्धति अपनाने में मदद करती है।
नाबार्ड समर्थित पहलों से यह स्पष्ट हुआ है कि जल उपलब्धता के अनुसार फसल योजना बनाने से जोखिम कम होता है और उत्पादकता बढ़ती है। ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई, मल्चिंग और फसल विविधीकरण जैसी तकनीकों को बढ़ावा देकर जल उपयोग दक्षता में सुधार लाया जा रहा है।
भारत में पशुधन की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। वर्ष 2019 की पशुधन गणना के अनुसार पशुओं की संख्या बढ़कर लगभग 53.6 करोड़ हो गई। इससे पशुओं के लिए पानी और चारे की मांग भी बढ़ी है। जल बजटिंग इन आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखकर समग्र जल प्रबंधन सुनिश्चित करती है।
अटल भूजल योजना से बदली तस्वीर
वर्ष 2019 में शुरू की गई अटल भूजल योजना भूजल संकट वाले सात राज्यों के 229 ब्लॉकों में लागू की गई। इस योजना के तहत ग्राम पंचायत स्तर पर जल बजट तैयार किए जा रहे हैं और स्थानीय समुदायों को जल संरक्षण गतिविधियों से जोड़ा गया है।
मार्च 2026 तक लगभग 81,700 जल संरक्षण और पुनर्भरण संरचनाओं का निर्माण या जीर्णोद्धार किया जा चुका है। योजना के तहत 8,203 जल बजट तैयार किए गए हैं। इसके साथ ही 1.25 लाख से अधिक प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक बनाया गया है।
इन प्रयासों के परिणामस्वरूप 229 में से 180 ब्लॉकों में भूजल स्तर में सुधार दर्ज किया गया है। यह दर्शाता है कि सहभागी जल प्रबंधन किस प्रकार सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है।
हिवरे बाजार बना प्रेरणा मॉडल
हिवरे बाज़ार गांव आज देश में सामुदायिक जल प्रबंधन का सफल उदाहरण बन चुका है। कभी सूखे और जल संकट से जूझने वाला यह गांव अब जल आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गया है।
ग्राम सभा स्तर पर वार्षिक जल बजट तैयार कर किसानों को उपलब्ध पानी के अनुसार फसल चयन के लिए प्रेरित किया गया। भूजल के अत्यधिक दोहन को रोकने के लिए गहरे बोरवेल पर प्रतिबंध लगाया गया। वर्षा जल संचयन और जलग्रहण विकास जैसे उपायों ने गांव की तस्वीर बदल दी।
इस मॉडल से प्रेरित होकर महाराष्ट्र सरकार ने अपनी सूखा-रोधी रणनीति में जल बजटिंग को शामिल किया है और हर वर्ष हजारों गांवों को जल सुरक्षित बनाने का लक्ष्य रखा है।
महिलाओं की बढ़ती भागीदारी
राष्ट्रीय जल मिशन के अंतर्गत “नारी शक्ति से जल शक्ति” अभियान महिलाओं को जल संरक्षण और प्रबंधन में सक्रिय भूमिका दे रहा है। स्वयं सहायता समूहों और ग्राम जल समितियों के माध्यम से महिलाएं जल शासन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रही हैं।
उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले में जल जीवन मिशन के तहत 1,600 से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया है। महिला नेतृत्व वाली समितियां गांवों में जल संरक्षण और स्वच्छता अभियान चला रही हैं।
राजस्थान का सामुदायिक मॉडल
राजस्थान में मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान के तहत “फोर वाटर्स कॉन्सेप्ट” आधारित जल संरक्षण मॉडल लागू किया गया। इसमें वर्षा जल, भूजल, मिट्टी की नमी और सतही जल के संरक्षण पर जोर दिया गया।
ग्राम सभा स्तर पर जल बजटिंग को संस्थागत रूप देने से समुदाय स्वयं जल उपलब्धता का आकलन कर विभिन्न जरूरतों के लिए जल आवंटन तय कर रहे हैं। इस पहल से भूजल स्तर में वृद्धि, मिट्टी की उर्वरता में सुधार और लाखों लोगों तथा पशुओं के लिए जल उपलब्धता सुनिश्चित हुई है।
तकनीक से आसान हुआ जल प्रबंधन
“वरुणी वेब एप्लीकेशन” जैसी डिजिटल तकनीकें जल बजटिंग को और अधिक वैज्ञानिक और प्रभावी बना रही हैं। यह प्लेटफॉर्म वर्षा, फसल पैटर्न, भूमि उपयोग और जनसंख्या से संबंधित सरकारी डेटा का उपयोग कर ब्लॉक स्तर पर जल बजट तैयार करता है।
इस तकनीक की सहायता से स्थानीय प्रशासन जल की कमी या अधिकता का सटीक आकलन कर सकता है और आवश्यक कदम उठा सकता है। इससे जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और कुशल सिंचाई पद्धतियों को बढ़ावा मिल रहा है।
जलयुक्त शिवर अभियान की सफलता
महाराष्ट्र सरकार का “जलयुक्त शिवर अभियान” ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। वर्ष 2014 में शुरू किए गए इस अभियान के तहत जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण और ग्राम स्तर पर जल बजटिंग को बढ़ावा दिया गया।
अभियान के परिणामस्वरूप 11 हजार से अधिक गांवों को सूखा मुक्त घोषित किया गया है। कई क्षेत्रों में भूजल स्तर में 1.5 से 2 मीटर तक वृद्धि दर्ज की गई और कृषि उत्पादकता में 30 से 50 प्रतिशत तक सुधार हुआ है।
सामुदायिक भागीदारी से मजबूत होगा जल भविष्य
जल संकट से निपटने के लिए केवल सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए समुदाय आधारित, डेटा-आधारित और सहभागी दृष्टिकोण आवश्यक है। जल बजटिंग गांवों को अपनी जल आवश्यकताओं और उपलब्ध संसाधनों के बीच संतुलन स्थापित करने की क्षमता प्रदान करती है।
हिवरे बाजार जैसे मॉडल और अटल भूजल योजना जैसी पहलकदमियां यह सिद्ध करती हैं कि स्थानीय भागीदारी, नीति समर्थन और तकनीक के समन्वय से जल संकट वाले क्षेत्रों को आत्मनिर्भर बनाया जा सकता है।
दीर्घकालिक जल सुरक्षा, कृषि संवहनीयता और ग्रामीण विकास सुनिश्चित करने के लिए जल बजटिंग को ग्राम स्तर से लेकर राष्ट्रीय योजना निर्माण तक संस्थागत रूप देना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है।





















