
अलवर में तहसीलदार और एक दलाल को 1.50 लाख रुपये की रिश्वत लेते हुए पकड़े जाने का मामला सामने आया है। आरोप है कि नामांतरण के बदले 5 लाख रुपये की मांग की गई थी और पहली किस्त लेते ही दोनों को ट्रैप कर लिया गया

यह घटना दिखाती है कि जमीन से जुड़े काम, जो आम नागरिक का अधिकार हैं, उन्हें भी कई जगह सेवा नहीं बल्कि सौदे की तरह देखा जा रहा है। आम आदमी अपने ही हक के काम के लिए दलालों और भ्रष्ट तंत्र के बीच फंस जाता है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इस तरह के मामलों में अक्सर एक पूरा नेटवर्क काम करता है, जहां बिना पैसे दिए फाइल आगे बढ़ना मुश्किल हो जाता है। इससे न केवल लोगों का समय और पैसा बर्बाद होता है, बल्कि सरकारी व्यवस्था पर भरोसा भी कमजोर पड़ता है।
ऐसी कार्रवाइयां यह जरूर दिखाती हैं कि निगरानी तंत्र सक्रिय है, लेकिन असली जरूरत है कि व्यवस्था इतनी पारदर्शी बने कि रिश्वत की गुंजाइश ही खत्म हो जाए।
जब तक अधिकार को “सेवा” के बजाय “मौका” समझा जाएगा, तब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे। बदलाव तभी आएगा जब सिस्टम और समाज दोनों भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रुख अपनाएं ल





















