
वृत्तचित्र आने वाली पीढ़ियों के लिए इतिहास और संस्कृति को संरक्षित करने में मददगार: 19वें एमआईएफएफ में रमेश पटांगे का कथन
19वें मुंबई अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (एमआईएफएफ) में इंडियन डॉक्यूमेंट्री प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन (आईडीपीए) के ओपन फोरम के हिस्से के रूप में, “स्ट्रीमिंग रिवॉल्यूशन: डॉक्यूमेंटिंग इन द एज ऑफ ओटीटी” विषय पर एक सत्र में ओटीटी, मीडिया और वृत्तचित्र क्षेत्रों के विशेषज्ञों को एक साथ लाया गया ताकि इस बात पर चर्चा की जा सके कि स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म वृत्तचित्र फिल्म निर्माण को कैसे बदल रहे हैं और फिल्म निर्माताओं के लिए नए अवसर पैदा कर रहे हैं।
इस पैनल में शेमारू की बिजनेस हेड किन्नरी दवे, वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी साउथ एशिया के कंटेंट हेड साई अभिषेक, वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और पद्म श्री पुरस्कार विजेता रमेश पटांगे और अनुभवी छायाकार एवं फिल्म निर्माता धर्म गुलाटी शामिल थे। सत्र का संचालन फिल्म निर्माता ललित वचानी ने किया।

चर्चा का केंद्र बिंदु यह था कि ओटीटी प्लेटफॉर्म ने वृत्तचित्रों के वितरण को किस प्रकार बदल दिया है, जिससे फिल्में फिल्म समारोहों, फिल्म समितियों और सार्वजनिक प्रसारकों से परे जाकर भारत और विश्व भर के व्यापक दर्शकों तक पहुंच गई हैं। पैनलिस्ट इस बात पर सहमत थे कि स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ने फिल्म निर्माताओं को अपना काम प्रदर्शित करने और दर्शकों से सीधे जुड़ने के नए अवसर प्रदान किए हैं।
साई अभिषेक ने कहा कि वृत्तचित्र वार्नर ब्रदर्स डिस्कवरी की कंटेंट रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं। उन्होंने बताया कि इतिहास, पौराणिक कथाएं, रोमांच, जीवनी और सच्ची अपराध कथाएं जैसी विधाएं दर्शकों को काफी आकर्षित कर रही हैं। उन्होंने यह भी कहा कि प्लेटफॉर्म मौलिक कहानियों, अनूठी पहुंच और नए दृष्टिकोणों की तलाश में हैं, विशेष रूप से भारत की ऐसी कहानियों की जो वैश्विक दर्शकों को पसंद आ सकें।
किन्नरी शाह ने दर्शकों की बदलती प्राथमिकताओं को समझने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि आज के दर्शक आकर्षक कहानी की अपेक्षा रखते हैं और फिल्म निर्माताओं को अपनी कहानियों की प्रामाणिकता बनाए रखते हुए, देखने की बदलती आदतों के अनुरूप ढलना होगा। उन्होंने वृत्तचित्र निर्माताओं को नवीन विचारों के साथ ओटीटी प्लेटफॉर्म से सक्रिय रूप से जुड़ने के लिए भी प्रोत्साहित किया।
धर्म गुलाटी ने वृत्तचित्रों को अधिक व्यापक स्तर पर प्रदर्शित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि कई प्रशंसित वृत्तचित्र फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय समारोहों में पहचान तो मिलती है, लेकिन भारत में उन्हें व्यापक वितरण और दर्शक वर्ग प्राप्त करने में अक्सर कठिनाई होती है।
वृत्तचित्रों की सामाजिक भूमिका के बारे में रमेश पटांगे ने कहा कि ये महान व्यक्तित्वों के जीवन और योगदान के बारे में लोगों को शिक्षित करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हैं। उन्होंने कहा कि वृत्तचित्र इतिहास को संरक्षित करने, सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने और युवा पीढ़ी को भारत की सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय मूल्यों से परिचित कराने में सहायक होते हैं।

सत्र का समापन कहानी कहने की कला, वितरण, दर्शकों की सहभागिता और ओटीटी युग में वृत्तचित्र फिल्म निर्माण के भविष्य पर एक संवादात्मक चर्चा के साथ हुआ।
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