

रायगढ़ मॉडल से छत्तीसगढ़ में जैव-संसाधन केंद्रों के लिए व्यावहारिक एवं विस्तार योग्य मानक संचालन प्रक्रिया विकसित करने में मिलेगी मदद
Raipur chhattisgarh VISHESH / भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद–जैविक तनाव प्रबंधन राष्ट्रीय संस्थान (आईसीएआर-एनआईबीएसएम), रायपुर के संयुक्त निदेशक डॉ. अमरेंद्र रेड्डी, एफएनएएएस ने रायगढ़ जिले के विभिन्न गांवों का दौरा कर पुनर्योजी कृषि पद्धतियों के क्रियान्वयन और प्रोफेशनल असिस्टेंस फॉर डेवलपमेंट एक्शन (पीआरएडीएएन) के सहयोग से स्थापित जैव-संसाधन केंद्र की कार्यप्रणाली का जायजा लिया।
भिखारीमाल गांव के भ्रमण के दौरान डॉ. रेड्डी ने लगभग पांच एकड़ में सब्जियों तथा करीब आठ एकड़ में धान की खेती कर रहे पुनर्योजी कृषि अपनाने वाले किसानों से संवाद किया। किसानों ने रासायनिक आधारित पारंपरिक खेती से पुनर्योजी कृषि की ओर बढ़ने के अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने मृदा क्षरण, कृषि लागत में वृद्धि, कीट एवं रोगों की बढ़ती समस्या तथा बाहरी कृषि इनपुट पर निर्भरता को खेती में बदलाव के प्रमुख कारणों के रूप में बताया।


किसानों और पीआरएडीएएन टीम ने स्थानीय स्तर पर तैयार किए जा रहे पुनर्योजी कृषि इनपुट, जिनमें सुपरकम्पोस्ट, मल्टीसीड्स, अग्निअस्त्र, ब्रह्मास्त्र और उन्नत फार्मयार्ड मैन्योर शामिल हैं, की तैयारी एवं उपयोग की प्रक्रिया का प्रदर्शन किया। किसानों ने बताया कि इन पद्धतियों को अपनाने के बाद मिट्टी की स्थिति, फसल वृद्धि और समग्र फसल स्वास्थ्य में सुधार देखने को मिला है।

कोटरापाली में डॉ. रेड्डी ने ग्राम संगठन के सदस्यों से बातचीत कर किसानों के समूह निर्माण, ग्राम स्तर पर योजना तैयार करने तथा पुनर्योजी कृषि के क्रियान्वयन से जुड़े संस्थागत तंत्र की जानकारी ली। उन्होंने लगभग दो एकड़ क्षेत्र में विकसित मिश्रित फसल आधारित पुनर्योजी कृषि प्लॉट का भी निरीक्षण किया, जहां अरबी, करेला, बैंगन और मूंगफली की खेती की जा रही थी।
नौरंगपुर में डॉ. रेड्डी ने पीआरएडीएएन के सहयोग से स्थापित जैव-संसाधन केंद्र की गतिविधियों की समीक्षा की। केंद्र की टीम ने सुपरकम्पोस्ट, अग्निअस्त्र, ब्रह्मास्त्र, मल्टीसीड, नीमास्त्र, बीजामृत, मठास्त्र और जीवामृत के उत्पादन की प्रक्रिया का प्रदर्शन किया। इस दौरान कच्चे माल की उपलब्धता एवं खरीद, उत्पादन प्रक्रिया, गुणवत्ता प्रबंधन, मूल्य निर्धारण, पैकेजिंग, अभिलेखीकरण तथा किसानों तक जैव-इनपुट की आपूर्ति से जुड़े विषयों पर विस्तार से चर्चा की गई।
दौरे के दौरान विकेंद्रीकृत जैव-संसाधन केंद्रों की भूमिका विशेष रूप से रेखांकित हुई। ऐसे केंद्र स्थानीय स्तर पर तैयार जैव-इनपुट की समय पर उपलब्धता सुनिश्चित करने, ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने तथा किसानों की बाहरी रासायनिक इनपुट पर निर्भरता कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। साथ ही, ये केंद्र टिकाऊ और पुनर्योजी कृषि पद्धतियों को व्यापक स्तर पर अपनाने के लिए सामुदायिक संस्थागत आधार उपलब्ध करा सकते हैं।
डॉ. रेड्डी ने किसानों की सक्रिय भागीदारी और उनके स्वामित्व भाव की सराहना की। उन्होंने जैव-संसाधन केंद्र के व्यवस्थित संचालन एवं दस्तावेजीकरण को भी महत्वपूर्ण बताया। दौरे के दौरान प्राप्त जमीनी अनुभव और केंद्र की संचालन प्रक्रियाएं छत्तीसगढ़ में जैव-संसाधन केंद्रों के लिए व्यावहारिक, किसान-केंद्रित और व्यापक स्तर पर लागू की जा सकने वाली मानक संचालन प्रक्रिया (Standard Operating Procedure) विकसित करने में उपयोगी होंगी।
इस दौरे के माध्यम से रायगढ़ टीम द्वारा विकसित पुनर्योजी कृषि तंत्र के विभिन्न पहलुओं को भी समझने का अवसर मिला। इस तंत्र में किसानों का संगठनीकरण, क्षमता निर्माण, खेत स्तर पर पुनर्योजी कृषि को अपनाना, जैव-इनपुट का स्थानीय उत्पादन, ग्रामीण उद्यमिता तथा सामुदायिक संस्थाओं की भागीदारी शामिल है। दौरे ने यह रेखांकित किया कि सामुदायिक स्तर पर संचालित जैव-संसाधन केंद्र टिकाऊ कृषि को मजबूत करने और किसानों को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध जैव-इनपुट समय पर उपलब्ध कराने के लिए एक प्रभावी संस्थागत माध्यम बन सकते हैं।





















