

स्वतंत्र भारत के मशालवाहक
श्री सी. पी. राधाकृष्णन

भारत के 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह के इस महत्वपूर्ण अवसर पर मैं प्रत्येक भारतवासी को हार्दिक बधाई देता हूं। साथ ही, मैं उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों को सादर नमन करता हूं, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।
पिछले सप्ताह अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह की अपनी यात्रा के दौरान मुझे हर घर तिरंगा अभियान के अंतर्गत हमारे राष्ट्रीय ध्वज फहराने तथा महान देशभक्त नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी द्वारा तिरंगा फहराए जाने की ऐतिहासिक स्मृति को नमन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। यह मेरे लिए अत्यंत भावुक और गौरवपूर्ण अनुभव था कि मैं उस पवित्र धरती पर खड़ा था, जहां श्री नेताजी की आज़ाद हिंद फ़ौज ने 30 दिसंबर 1943 को भारत की भूमि पर पहली बार तिरंगा फहराया था। इस अवसर ने मुझे सितंबर 1939 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस जी की मदुरै यात्रा का भी स्मरण कराया, जब वे महान स्वतंत्रता सेनानी पसुम्पोन मुथुरामलिंगा थेवर जी के निमंत्रण पर वहां पहुंचे थे। उस ऐतिहासिक क्षण ने क्षेत्र के असंख्य देशभक्तों के हृदय में स्वतंत्रता की अलख जगाई।
अंडमान स्थित राष्ट्रीय स्मारक सेल्युलर जेल की मेरी यात्रा एक अन्य अत्यंत प्रेरणादायी क्षण रही। इसी जेल में भारत माता के महान सपूत श्री वीर सावरकर जी, श्री योगेंद्र शुक्ल जी, श्री बटुकेश्वर दत्त जी, श्री सचिंद्र नाथ सान्याल जी और अनेक अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को औपनिवेशिक शक्तियों द्वारा कैद कर एकांत कारावास में रखा गया था। आज भी राष्ट्रीय स्मारक की ये दीवारें उन वीरों के साहस, उन्हें दी गई यातनाओं और सर्वोच्च बलिदान की गाथाएं सुनाती प्रतीत होती हैं, जिन्होंने भारत की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया। इस यात्रा ने मुझे उन सभी राष्ट्रनायकों के प्रति श्रद्धांजलि स्वरूप यह लेख लिखने को प्रेरित किया, जिन्होंने करोड़ों लोगों के हृदय में देशभक्ति की ज्वाला प्रज्वलित की और राष्ट्र को स्वतंत्रता प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ाया।
9 अगस्त को, जब हम भारत छोड़ो आंदोलन की स्मृति मना रहे थे, मुझे अंडमान द्वीप समूह में हर घर तिरंगा अभियान का शुभारंभ करने का अवसर प्राप्त हुआ। वर्ष 1942 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान करते हुए राष्ट्र को करो या मरो का ओजस्वी नारा दिया था। इस आह्वान के परिणामस्वरूप पूरे देश में आजादी प्राप्त करने की प्रबल आकांक्षा व्याप्त हो गई।
आज हमें उसी स्वतंत्रता सेनानी पीढ़ी के कारण स्वतंत्रता की हवा में सांस लेने और लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत संवैधानिक अधिकारों के साथ जीवन जीने का सौभाग्य प्राप्त है, जिन्होंने अपने समय की औपनिवेशिक शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष किया। उस समय देश के कोने-कोने में करोड़ों वीर स्वतंत्रता सेनानी अटूट समर्पण और त्याग के साथ इस संघर्ष में शामिल हुए तथा अनेक वीरों ने भारत माता की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
स्वतंत्रता सेनानियों की गौरवगाथा
स्वतंत्रता सेनानी चाहे उत्तर में कश्मीर से हों या दक्षिण में तमिलनाडु से, पश्चिम में गुजरात से हों या पूर्व में असम से—देश के सभी क्षेत्रों, वर्गों, आयु समूहों और लिंगों के लोगों ने भारत माता की स्वतंत्रता के साझा लक्ष्य के लिए एकजुट होकर संघर्ष किया।
प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान प्रतिरोध की अमर प्रतीक बनीं रानी लक्ष्मीबाई जी का शौर्य, मंगल पांडे जी का साहस और बाल गंगाधर तिलक जी का वह निर्भीक उद्घोष—स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा—स्वतंत्रता की ओर बढ़ते राष्ट्र के प्रत्येक कदम को शक्ति प्रदान करता रहा।
इसी क्रम में वी. ओ. चिदंबरम पिल्लै जी ने भारत का पहला स्वदेशी पोत-परिवहन उद्यम शुरू कर औपनिवेशिक शासन के आर्थिक प्रभुत्व को चुनौती दी। इससे यह सिद्ध हुआ कि स्वतंत्रता का संघर्ष केवल रणभूमि तक सीमित नहीं था, बल्कि आर्थिक और व्यावसायिक क्षेत्र में भी लड़ा गया था।
भगत सिंह जी, राजगुरु जी और सुखदेव जी की क्रांतिकारी भावना ने आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता के लिए त्याग और बलिदान का मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी। वहीं रानी गैदिनल्यू जी की अदम्य भावना ने पूर्वोत्तर भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध प्रतिरोध की लौ प्रज्वलित रखी।
असम की युवा वीरांगना कनकलता बरुआ जी भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व करते हुए अपने हाथों में राष्ट्रीय ध्वज लेकर अदम्य साहस के साथ आगे बढ़ीं और अपने प्राणों का बलिदान कर दिया। भगवान बिरसा मुंडा जी तथा अनेक जनजातीय नेताओं ने भी औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध ऐतिहासिक प्रतिरोध का नेतृत्व किया।
इतिहास के पन्नों में ऐसी असंख्य गाथाएं हैं, जो साहस, संघर्ष, धैर्य और दृढ़ संकल्प से भरी हुई हैं। इन सभी गाथाओं ने मिलकर साहस और बलिदान की समृद्ध विरासत का निर्माण किया है। वे हमें याद दिलाती हैं कि भारत की स्वतंत्रता अनगिनत वीरों के सामूहिक संकल्प से प्राप्त हुई थी और उनकी विरासत आज भी पीढ़ियों को प्रेरित करती है।
स्वतंत्रता आंदोलन में तिरुप्पुर का योगदान
इस स्वतंत्रता दिवस पर मैं तिरुप्पुर कुमारन जी को श्रद्धापूर्वक नमन करता हूं, जिन्हें लोकप्रिय रूप से कोडी काथा कुमारन अर्थात ध्वज की रक्षा करने वाले कुमारन के नाम से जाना जाता है। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान मेरे पैतृक स्थान तिरुप्पुर में उन्होंने आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। मृत्यु निकट जानते हुए भी उन्होंने राष्ट्रीय ध्वज को धरती पर नहीं गिरने दिया। इसी कारण उन्हें यह सम्मानजनक उपाधि मिली।
कम उम्र में ही कुमारन जी के हृदय में देशभक्ति की लौ प्रज्वलित हो उठी थी। स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है के आह्वान से प्रेरित होकर वे स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए। महात्मा गांधी जी के आदर्शों से अत्यंत प्रभावित होकर कुमारन जी ने लोगों, विशेषकर युवाओं में राष्ट्रवाद की भावना जगाने के लिए देशबंधु युवा संघ की स्थापना की। कुमारन जी का दृढ़ विश्वास था कि सच्ची स्वतंत्रता तभी प्राप्त की जा सकती है, जब लोग औपनिवेशिक शासन के अन्याय के प्रति जागरूक हों और उसके विरुद्ध संघर्ष करने का साहस तथा स्पष्ट दृष्टि विकसित करें।
गांधीवादी सामाजिक सुधार के सिद्धांतों के प्रति समर्पित कुमारन जी ने मद्यनिषेध अभियान को भी सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया। वे इसे सामाजिक और राष्ट्रीय पुनर्जागरण की दिशा में आवश्यक कदम मानते थे। इसी उद्देश्य से उन्होंने ताड़ी की दुकानों के सामने विरोध प्रदर्शन में भाग लिया और लोगों को मद्यपान से दूर रहने तथा आत्म-अनुशासन अपनाने के लिए प्रेरित किया।
10 जनवरी 1932 को सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान कुमारन जी ने एक जुलूस का नेतृत्व किया। हाथों में राष्ट्रीय ध्वज थामे वे कुछ साहसी साथियों के साथ आगे बढ़े और तिरुप्पुर की सड़कों पर वंदे मातरम् के जोशीले नारे गूंज उठे।
औपनिवेशिक शक्तियों ने इस समूह पर हमला कर दिया। वंदे मातरम् का उद्घोष करते हुए और राष्ट्रीय ध्वज को अपने शरीर से लगाए कुमारन जी के सिर पर गंभीर चोटें आईं और राष्ट्र के लिए उन्होंने अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। मृत्यु के समय उनकी आयु मात्र 27 वर्ष थी।
जब मैं तिरुप्पुर कुमारन जी की आयु का उल्लेख करता हूं, तो मुझे उन अनेक युवाओं की याद आती है, जिन्होंने भारत माता के लिए अपने प्राण बलिदान कर दिए। इनमें भगत सिंह जी (23 वर्ष), सुखदेव जी (23 वर्ष), राजगुरु जी (22 वर्ष), खुदीराम बोस जी (18 वर्ष), कनकलता बरुआ जी (18 वर्ष), अनंत लक्ष्मण कान्हेरे जी (19 वर्ष), वंचिनाथन जी (25 वर्ष) और ऐसे अनेक युवा शामिल हैं। उन्होंने नश्वर जीवन त्याग कर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में अमर स्थान प्राप्त किया।
मैं माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी की उस पहल की सराहना करता हूं, जिससे राष्ट्रीय आंदोलन के उन गुमनाम नायकों को देश के सामने लाया जा रहा है, जिनका योगदान लंबे समय तक इतिहास के पन्नों में अपेक्षाकृत अनदेखा रहा। मैं सभी ज्ञात और अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।
इस ऐतिहासिक अवसर पर आइए, हम अपनी मातृभूमि के प्रति अपने दायित्वों पर चिंतन करें और अपनी प्रतिबद्धता पुनः दृढ़ करें। इस अमृतकाल में 2047 तक विकसित भारत के निर्माण के स्वयं को समर्पित करें और राष्ट्र की प्रगति तथा समृद्धि के लिए मिलकर कार्य करें।
यही उन वीर सपूतों के प्रति हमारी सबसे सच्ची और उचित श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने अटूट साहस के साथ संघर्ष किया और हमारी स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण उत्सर्ग किए।
जय हिंद!
भारत माता अमर रहे!
(लेखक भारत के उपराष्ट्रपति हैं।)





















