
श्री राजेश अग्रवाल
Raipur chhattisgarh VISHESH : बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली औचित्य के गहरे संकट का सामना कर रही है। बीसवीं सदी के उत्तरार्ध और इक्कीसवीं सदी की शुरुआत में, विश्व व्यापार संगठन (डब्लूटीओ) वैश्विक व्यापार का केंद्रीय स्तंभ था, जो नियम-आधारित व्यवस्था की पेशकश करने के साथ तटस्थता, पूर्वानुमेयता और निष्पक्षता का वादा करता था। हालांकि आज, ये वादे काफी कमजोर प्रतीत होते हैं। डब्लूटीओ में विश्वास की कमी, किसी एक विफलता का परिणाम नहीं है, बल्कि यह संरचनात्मक असंतुलन, असमान प्रवर्तन और वैश्विक आर्थिक शक्ति के बदलते स्वरुप के संचयी प्रभाव को प्रतिबिंबित करती है।

इस संकट के मूल में है – वैश्विक उत्पादन का अत्यधिक केंद्रीकरण और आक्रामक व्यापार प्रथाओं की निरंतरता। समय के साथ, आपूर्ति श्रृंखलाएँ परस्पर अत्यधिक निर्भर हो गई हैं और उनका वितरण भी असमान है, जहाँ कुछ प्रमुख अर्थव्यवस्थाएँ महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर अनुपात से कई गुनी ज्यादा नियंत्रण रखती हैं। हालांकि, इस केंद्रीकरण ने कुछ मामलों में वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक कुशल बना दिया है, लेकिन इसने उन्हें काफी हद तक कमजोर भी बना दिया। व्यवधान—चाहे भू-राजनीतिक हो, आर्थिक हो, या पर्यावरण-संबंधी हों—अब प्रणालीगत नतीजे लेकर आते हैं। परिणामस्वरूप, आपूर्ति श्रृंखला की कमजोरी अब केवल एक आर्थिक चिंता के रूप में नहीं देखी जाती; इसे अब राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक अस्तित्व के मामले के तौर पर देखा जाने लगा है।
धारणा में हुए बदलाव ने नीतिगत प्रतिक्रियाओं की एक ऐसी लहर को जन्म दिया है, जो बहुपक्षवाद के मौलिक सिद्धांतों को चुनौती देती हैं। देश घरेलू हितों की रक्षा के लिए संरक्षण उपायों, आक्रामक औद्योगिक नीतियों और निर्यात नियंत्रण को अपना रहे हैं। हालांकि ऐसी रणनीतियाँ अल्पकालिक सहनशीलता ला सकती हैं, लेकिन वे डब्लूटीओ की सहयोग भावना और कानूनी रूपरेखा को अक्सर कमजोर कर देती हैं। तकनीकी अवरोध, महत्वपूर्ण आपूर्ति श्रृंखलाओं पर नियंत्रण और भू-राजनीतिक प्रभाव के उपकरण के रूप में बाज़ार पहुंच का बढ़ता उपयोग एक व्यापक परिवर्तन का संकेत देता है: व्यापार अब केवल आर्थिक लेन-देन ही नहीं, बल्कि रणनीतिक शक्ति के बारे में है।
डब्लूटीओ सदस्यों के बीच एक व्यापक रूप से मान्य दृष्टिकोण यह है कि संगठन प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को उनके प्रतिबद्धताओं के प्रति जवाबदेह ठहराने में अक्षम रहा है और इसने वर्तमान स्थिति में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जब नियम असमान रूप से लागू किए जाते हैं या प्रवर्तन तंत्र विफल हो जाते हैं, तो प्रणाली में विश्वास कमजोर हो जाता है। कई देशों में, विशेष रूप से वैश्विक दक्षिण के देशों में, यह धारणा मजबूत हुई है कि डब्लूटीओ अब एक निष्पक्ष मध्यस्थ के रूप में कार्य नहीं करता। इसके बजाय, इसे एक ऐसे संस्थान के रूप में देखा जाता है, जो तेजी से बदलती वैश्विक अर्थव्यवस्था की वास्तविकताओं के प्रति अनुकूल होने के लिए संघर्ष कर रहा है।
इस संदर्भ में, सुधार प्रयासों का केंद्रीय उद्देश्य डब्लूटीओ की विश्वसनीयता को बहाल करना हो गया है। यद्यपि डब्लूटीओ सुधार की आवश्यकता पर सदस्यों के बीच व्यापक सहमति है, फिर भी इसे हासिल करने के तरीके पर सहमति न के बराबर है। सुधार की संरचना और विषय वस्तु पर बहसें लगातार विवादास्पद होती जा रही हैं। याओंडे के मंत्रिस्तरीय सम्मेलन में, सदस्यों ने डब्लूटीओ के मूलभूत सिद्धांतों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुन: पुष्टि की, जिनमें निष्पक्षता, पारदर्शिता, समावेश और सहमति-आधारित निर्णय शामिल हैं। इन सिद्धांतों ने लंबे समय से डब्लूटीओ को अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से अलग बनाये रखा है, यह सुनिश्चित करते हुए कि सभी सदस्य, चाहे उनका आकार या उनकी आर्थिक शक्ति कुछ भी हो, वैश्विक व्यापार नियमों को अंतिम रूप देने में अपनी बात रख सकें। हालांकि, इन सिद्धांतों के व्यावहारिक अनुप्रयोग को, विशेष रूप से बहुपक्षीय समझौतों से जुड़ी चर्चाओं में, समस्याओं का सामना करना पड़ा है। ये समझौते डब्लूटीओ सदस्यों के उपसमूहों के बीच बातचीत के बाद तैयार किए गए हैं। इन्हें कई देश—विशेष रूप से वैश्विक उत्तर के देश —सहमति-आधारित नियम निर्माण की चुनौतियों का व्यावहारिक समाधान मानते हैं। ऐसी सदस्यता के लिए, जहां विकास स्तर और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में व्यापक असमानताएँ मौजूद हैं, जटिल मुद्दों पर सर्वसम्मति प्राप्त करना कठिन होता जा रहा है। बहुपक्षीय समझौते आगे बढ़ने का एक तरीका प्रदान करते हैं, जिससे इच्छुक प्रतिभागी नए नियम स्थापित कर सकते हैं, इसमें उन देशों को रुकावट नहीं माना जाता, जो प्रतिबद्ध होने के लिए अभी तैयार नहीं हैं, ऐसी ही प्रणाली डब्लूटीओ से पहले गैट, 1947 (टैरिफ और व्यापार पर सामान्य समझौता) के तहत अस्तित्व में थी।
इस मुद्दे पर भारत का रुख एक सावधानीपूर्वक तैयार संतुलनकारी कार्य को दर्शाता है। नियम-निर्माण को आगे बढ़ाने में बहुपक्षीय समझौतों की क्षमता को स्वीकार करते हुए भारत ने लगातार मजबूत सुरक्षा उपायों की मांग की है, ताकि ऐसे समझौतों द्वारा बहुपक्षीय प्रणाली को कमजोर न होना सुनिश्चित हो सके। बहुपक्षीय समझौतों को प्रमुख डब्लूटीओ सिद्धांतों को दरकिनार नहीं करना चाहिए, मौजूदा कार्यादेश को कमजोर नहीं करना चाहिए या गैर-प्रतिभागी सदस्यों के लिए नुकसानदेह नहीं होना चाहिए। उन्हें बहुपक्षीय रूपरेखा की जगह लेने के बजाय एक पूरक भूमिका निभानी चाहिए। भारत एक तदर्थ, समझौता-दर-समझौता मॉडल के बजाय बहुपक्षीय समझौतों को डब्लूटीओ संरचना में समेकित करने के लिए एक व्यापक और व्यवस्थित दृष्टिकोण का समर्थन करता है।
सुधार बहस का एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा, संगठन के पिछले कार्यादेशों को पूरा करने में विफलता से संबंधित है। यह कई विकासशील देशों के लिए असंतोष का एक प्रमुख कारण रहा है। ये अधूरी प्रतिबद्धताएं—जिनमें कृषि, विकास और विशेष व्यवहार प्रावधानों जैसे क्षेत्र शामिल हैं —केवल नियम बनाने की कमियों को ही नहीं दर्शातीं, बल्कि वैश्विक व्यापार प्रणाली में लंबे समय से मौजूद असमानताओं को दूर करने के अवसरों की चूक को भी उजागर करती हैं।
विशेष रूप से कृषि, इन असंतुलनों की गंभीरता को दर्शाती है। विकसित देशों ने अपने कृषि क्षेत्रों को सब्सिडी देने में महत्वपूर्ण लचीलापन बनाए रखा है, जिससे उनके किसान वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धी बने रहते हैं। वहीं, विकासशील देशों को अपने किसानों को दिए जाने वाले समर्थन के प्रकारों और स्तरों में प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है। यह विषमता संरचनात्मक असुविधाओं को बनाए रखती है, वैश्विक दक्षिण में लाखों लोगों की आजीविका को कमजोर करती है और वैश्विक व्यापार प्रवाह को विकृत करती है।
कृषि से परे, ऐसी न्यायसंगत रूपरेखाओं की मांग बढ़ रही है, जो प्रौद्योगिकी स्थानांतरण और क्षमता निर्माण को नियंत्रित करती हैं। तेज़ तकनीकी प्रगति के युग में ज्ञान, नवाचार और ज्ञान-कौशल तक पहुँच आर्थिक विकास का एक प्रमुख निर्धारक बन गया है। फिर भी, मौजूदा नियम अक्सर मौजूदा पदानुक्रम को मजबूत करते हैं, जिससे विकासशील देशों की मूल्य श्रृंखला में ऊपरी पायदान पर चढ़ने की क्षमता सीमित हो जाती है। अधिक समावेशी और संतुलित व्यापार प्रणाली बनाने के लिए इन असमताओं को दूर करना आवश्यक है।
विशेष और विभेदपूर्ण व्यवहार (एस एंड डीटी) पर बहस डब्लूटीओ सुधार की जटिलताओं को और अधिक उजागर करती है। एस एंड डीटी मूल रूप से सबसे कम विकसित और विकासशील देशों को गैर-पारस्परिक बाजार पहुँच और व्यापार प्रतिबद्धताओं को लागू करने में अधिक लचीलापन प्रदान करने के लिए डिजाइन किया गया था, जो अब एक विवादास्पद मुद्दा बन गया है। कुछ विकसित देशों का तर्क है कि स्व-निर्धारण की मौजूदा प्रणाली अपेक्षाकृत उन्नत अर्थव्यवस्थाओं को उन प्रावधानों से लगातार लाभ उठाने की अनुमति देती है, जो कम विकसित राष्ट्रों के लिए बनाए गए थे। भारत इन चिंताओं को स्वीकार करता है, लेकिन सकल आर्थिक आकार जैसे मनमाने पैमानों पर आधारित सरल समाधानों के प्रति आगाह भी करता है।
इसके बजाय, ध्यान यह सुनिश्चित करने पर होना चाहिए कि एस एंड डीटी वास्तविक विकासात्मक जरूरतों को पूरा करने के लिए एक प्रभावी उपकरण बना रहे। इसके लिए एक अधिक सूक्ष्म दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है—ऐसा दृष्टिकोण, जो विकासशील दुनिया में मौजूद आर्थिक स्थितियों की विविधता को मान्यता देता हो और उसी के अनुसार लचीलापन तैयार करता हो। यह मुद्दा और भी जटिल हो जाता है, क्योंकि कई विकसित देशों ने कृषि सब्सिडी अधिकारों के संदर्भ में, जिसे कभी-कभी विपरीत एस एंड डीटी कहा जाता है, का फायदा उठाना जारी रखा है।
अंततः, बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली का भविष्य इसके सदस्यों की प्रतिस्पर्धी हितों को सुलझाने और साझा संस्थानों में विश्वास पुनः स्थापित करने की क्षमता पर निर्भर करता है। चुनौतियाँ कठिन हैं, लेकिन हित इतने महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। एक कमजोर डब्लूटीओ से एक विभाजित वैश्विक अर्थव्यवस्था को जन्म देने का खतरा है, जो एकपक्षीय और शक्ति-आधारित सौदेबाज़ी पर आधारित हो सकती है। इसके विपरीत, सुधार किये गये और फिर से सशक्त बनाये गये डब्लूटीओ में एक अधिक सुदृढ़, समावेशी और सहयोगात्मक वैश्विक व्यवस्था को आधार प्रदान करने की क्षमता है।
भारत की व्यापक व्यापार रणनीति, बहुपक्षीय मंचों में भागीदारी को द्विपक्षीय और क्षेत्रीय समझौतों के साथ जोड़ती है। जैसे-जैसे व्यापार नीति जटिल होती जा रही है—जिसमें नियामक मानक, डिजिटल शासन और आपूर्ति श्रृंखला का एकीकरण शामिल है—समान विचारधारा वाले भागीदारों के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) मजबूत आर्थिक एकीकरण के महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में उभरे हैं। हालांकि, वर्तमान में जारी चर्चाओं में भारत की रचनात्मक भागीदारी इस कार्य की तात्कालिकता और जटिलता, दोनों को प्रतिबिंबित करती है। संतुलित, समावेशी और भविष्य-केंद्रित सुधारों को समर्थन देकर, भारत यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता है कि डब्लूटीओ तेजी से बदलती दुनिया में प्रासंगिक बना रहे—एक ऐसा संस्थान, जो न केवल व्यापार को प्रबंधित करने में सक्षम हो, बल्कि एक अधिक न्यायसंगत वैश्विक आर्थिक भविष्य को आकार देने की भी क्षमता रखता हो। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डब्लूटीओ व्यवसायों को निश्चितता, पूर्वानुमेयता, समावेशिता, समानता और सरलता प्रदान करता है, यानि नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था।
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व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।
लेखक वाणिज्य विभाग के सचिव हैं





















