
छत्तीसगढ़ के मीडिया दल ने महेश्वर में देखा लूम से लेकर खूबसूरत साड़ी बनने तक का सफर; केंद्र सरकार की ‘नेशनल हैंडलूम मिशन’ से मिल रहा बुनकरों को बढ़ावा
प्रविष्टि तिथि: 25 MAR 2026 10:07AM by PIB Raipur
पत्र सूचना कार्यालय, रायपुर द्वारा आयोजित मध्य प्रदेश मीडिया प्रवास के तहत छत्तीसगढ़ के मीडिया प्रतिनिधिमंडल ने आज ऐतिहासिक नगरी महेश्वर का दौरा किया। यहाँ पत्रकारों ने विश्व प्रसिद्ध महेश्वरी साड़ियों के निर्माण की बारीकियों को समझा और यह देखा कि कैसे एक कच्चे धागे से लेकर करघे (Loom) के माध्यम से एक अत्यंत सुंदर बुनी हुई साड़ी तैयार की जाती है।


मीडिया दल ने अजीज अंसारी (Handweave India) के हैंडलूम सेटअप का विशेष भ्रमण किया। अजीज अंसारी का परिवार पिछली 7 पीढ़ियों से इस पारंपरिक उद्योग से जुड़ा हुआ है। पत्रकारों से चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि उनके पास वर्तमान में 100 हैंडलूम का सेटअप है, जहाँ शुद्ध सूती और रेशमी धागों से कलाकृतियां उकेरी जाती हैं। इन हस्तनिर्मित साड़ियों की रेंज 3,000 रुपये से लेकर 12,000 रुपये तक होती है, जो अपनी गुणवत्ता और बारीक बुनाई के लिए देश-विदेश में प्रसिद्ध हैं।







भ्रमण के दौरान केंद्र सरकार के कपड़ा मंत्रालय द्वारा संचालित ‘नेशनल हैंडलूम मिशन’ की भूमिका और इसकी पृष्ठभूमि पर विस्तार से चर्चा की गई। पत्रकारों को बताया गया कि भारत में कृषि के बाद हैंडलूम क्षेत्र रोजगार का दूसरा सबसे बड़ा स्रोत है। इसी महत्व को देखते हुए, बुनकरों को स्थायी आजीविका प्रदान करने और उनके बुनियादी ढांचे के आधुनिकीकरण के उद्देश्य से इस मिशन की रूपरेखा तैयार की गई है। इस मिशन के माध्यम से बुनकरों को उन्नत करघे, कच्चे माल की आपूर्ति और रियायती ऋण जैसी वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

नर्मदा नदी के तट पर स्थित महेश्वर का इतिहास सदियों पुराना है। 18वीं शताब्दी में इंदौर की होल्कर रानी लोकमाता अहिल्याबाई होल्कर ने इस कला को विशेष संरक्षण दिया था। उन्होंने विशेष रूप से सूरत और मांडू के बुनकरों को यहाँ बसने के लिए आमंत्रित किया था, जिसके बाद ‘महेश्वरी साड़ी’ एक ब्रांड के रूप में उभरी। अपनी विशिष्ट ‘किनारी’ (Border) और ‘पल्लू’ के डिजाइनों के लिए मशहूर ये साड़ियाँ आज भी हस्तशिल्प का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
छत्तीसगढ़ के विभिन्न प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के पत्रकारों ने इस भ्रमण के माध्यम से यह जाना कि कैसे सरकारी योजनाओं के सहयोग से ग्रामीण स्तर पर स्वरोजगार और सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखा जा रहा है।
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एसवी/पीजे





















