

Raipur chhattisgarh VISHESH / Mumbai
महाराष्ट्र के अमरावती की रहने वाली कुमकुम मोहोद ने जब तीरंदाजी शुरू की, तो खेल के उपकरणों का खर्च उठाना भी उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी। उनके पिता अनिल मोहौड़ ने उनके लिए तीरंदाजी के जूतों की पहली जोड़ी 400 रुपये में खरीदी थी। जब उन्होंने पारंपरिक भारतीय लकड़ी के धनुष से रिकर्व धनुष का इस्तेमाल शुरू किया, तो जूतों की अगली जोड़ी के लिए 1,600 रुपये खर्च करने पड़े। आज 17 साल की उम्र में कुमकुम के पास जूतों की दस जोड़ियां और तीन धनुष हैं। प्रायोजक भी उनमें दिलचस्पी दिखा रहे हैं। वह 2026 के एशियाई खेलों में भारत की प्रमुख प्रदर्शन करने वाली खिलाड़ियों में से एक बनकर उभरी हैं।
उनका सफर कई त्यागों से भरा रहा है। कोविड महामारी के दौरान एक बार कुमकुम रो रही थीं। उन्हें चिंता थी कि कहीं उनके तीर टूट न जाएं, क्योंकि उनके पास नए तीर खरीदने के पैसे नहीं थे। उन्हें लग रहा था कि इसका असर उनके प्रदर्शन पर पड़ रहा है। अगले ही दिन उनके पिता अनिल ने 15,000 रुपये के तीर खरीदकर उन्हें दिए और वादा किया कि अब उन्हें तीरों की कमी नहीं होने देंगे। बेटी के सपनों को पूरा करने के लिए दस साल की बचत लगाने के बाद उन्होंने आखिरकार अपना मिठाई के डिब्बे बनाने का कारोबार भी बेच दिया। वह याद करते हुए कहते हैं, “कुमकुम की मां का सपना था कि वह तीरंदाज बने। मैं अपनी जिंदगी की दो सबसे अहम महिलाओं को कैसे निराश कर सकता था?”
पुणे जिले के पिंपरी की रहने वाली 18 वर्षीय पृथिका प्रदीप का सफर पांचवीं कक्षा में स्कूल की एक गतिविधि से शुरू हुआ। तीरंदाजी में दिलचस्पी बढ़ने के बाद उन्होंने एक साल बाद पेशेवर प्रशिक्षण लेना शुरू किया। धीरे-धीरे उनकी दिलचस्पी इस खेल के प्रति लगन में बदल गई। आज वह कोच कुणाल तावड़े के मार्गदर्शन में पिंपले गुरव स्थित एक तीरंदाजी केंद्र में प्रशिक्षण लेती हैं। अपने माता-पिता, प्रिया और प्रदीप के सहयोग से उन्होंने पढ़ाई और कड़े प्रशिक्षण के बीच संतुलन बनाए रखा। उनकी मेहनत का नतीजा 2026 के एशियाई खेलों में भारत के लिए जीते गए स्वर्ण पदक के रूप में सामने आया।
सतारा के 25 वर्षीय साहिल जाधव के लिए तीरंदाजी अब जीवन का हिस्सा बन चुकी है। कोच प्रवीण सावंत के मार्गदर्शन में प्रशिक्षण लेने वाले साहिल ने अनुशासन, शारीरिक फिटनेस और लगातार अपने प्रदर्शन में सुधार को अपने करियर का आधार बनाया है। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उनके माता-पिता ने यह सुनिश्चित किया कि प्रशिक्षण, उपकरण और प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के अवसर उनकी पहुंच में रहें। साहिल का कहना है कि भारतीय टीम की जर्सी पहनने का मतलब अपने सपनों के साथ माता-पिता के सपनों को भी आगे लेकर चलना है। उनके मुताबिक, तीरंदाजी में धैर्य और मानसिक मजबूती बहुत जरूरी है, क्योंकि एक छोटी-सी गलती भी मुकाबले का नतीजा बदल सकती है।
इन खिलाड़ियों की कहानियां खेल में सफलता के कई पहलुओं को सामने लाती हैं। इनमें परिवारों का त्याग, कम उम्र में प्रतिभा को निखारने का महत्व और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करने के लिए जरूरी अनुशासन शामिल हैं। ये कहानियां यह भी बताती हैं कि खिलाड़ियों की अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प के साथ संस्थागत स्तर पर लगातार सहयोग मिलना भी जरूरी है।
एनटीपीसी 2018 से अपनी कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी (सीएसआर) पहलों के तहत भारतीय तीरंदाजी को सहयोग दे रही है। इसके लिए राष्ट्रीय खेल विकास कोष (NSDF), भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) और भारतीय तीरंदाजी संघ (AAI) के माध्यम से 152.88 करोड़ रुपये की सहायता देने की प्रतिबद्धता जताई गई है। इस सहयोग में शुरुआती स्तर पर प्रतिभाओं की पहचान, प्रशिक्षण, खेल उपकरण, छात्रवृत्ति, अकादमियों और प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के अवसर उपलब्ध कराना शामिल है.
‘धनुर्विद्या प्रोजेक्ट’ इस प्रयास का एक अहम हिस्सा है। इसका उद्देश्य जमीनी स्तर पर खेल से जुड़ने वाले खिलाड़ियों को बेहतर प्रशिक्षण और अवसर देकर उन्हें उच्च स्तर की प्रतियोगिताओं तक पहुंचाना है। इसमें महिला खिलाड़ियों और पैरा-तीरंदाजों के लिए भी अवसर शामिल हैं।









