







Raipur chhattisgarh VISHESH /राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) रायपुर द्वारा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईसीटी अकादमी, आईआईटी गुवाहाटी के सहयोग से 12 अक्टूबर 2026 को “अंतरिक्ष एवं अंतरग्रहीय प्रणालियों के लिए उभरती प्रौद्योगिकियां (ETSIS-2026)” विषय पर पांच दिवसीय संकाय विकास कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। इस कार्यक्रम के मुख्य संरक्षक एनआईटी रायपुर के निदेशक डॉ. एन. वी. रमना राव हैं। उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आईएआरआई), नई दिल्ली के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. आर. एन. साहू उपस्थित रहे। साथ ही एनआईटी रायपुर के सेंटर ऑफ स्पेस एंड इंटरप्लेनेटरी एक्सप्लोरेशन (COSINE) के मेंटर प्रो. शुभाशिष सान्याल, अधिष्ठाता (अकादमिक) प्रो. शुभ्रता गुप्ता तथा आईआईटी गुवाहाटी के कंप्यूटर विज्ञान एवं अभियांत्रिकी विभाग के प्रो. प्रदीप कुमार दास भी समारोह में शामिल हुए। इस पांच दिवसीय कार्यक्रम के संयोजक डॉ. कपिल कुमार सोनी तथा समन्वयक डॉ. हिमांशु गोविल और डॉ. सौरभ गुप्ता हैं।
कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. कपिल कुमार सोनी के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने कार्यक्रम के उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए इस प्रकार की कार्यशालाओं के आयोजन में जुटी टीम के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने संस्थान में अनुसंधान को सुदृढ़ बनाने के लिए निदेशक की रणनीतिक सोच का उल्लेख किया तथा उभरते प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में नवाचार, सहयोग और व्यावहारिक शिक्षा के महत्व पर जोर दिया।

प्रो. प्रदीप कुमार दास ने कहा कि आने वाले वर्ष में ड्रोन और उनसे संबंधित प्रौद्योगिकियों का महत्व तेजी से बढ़ेगा। उन्होंने प्रतिभागियों को इन क्षेत्रों में गहन अध्ययन करने, विस्तृत नोट्स तैयार करने और विशेषज्ञता विकसित करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कृषि, आपदा प्रबंधन, निगरानी तथा बुनियादी ढांचे की निगरानी जैसे क्षेत्रों में ड्रोन के उपयोग की संभावनाओं पर चर्चा की और प्रतिभागियों से वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए नवाचारपूर्ण प्रयास करने का आह्वान किया।
प्रो. शुभाशिष सान्याल ने बताया कि इस संकाय विकास कार्यक्रम की परिकल्पना उनकी COSINE टीम के भीतर की गई थी। उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष एवं अंतरग्रहीय प्रणालियां बहुविषयक क्षेत्र हैं, जिनका दायरा केवल नासा और इसरो जैसी संस्थाओं तक सीमित नहीं है। इन क्षेत्रों के विकास में कंप्यूटर विज्ञान, मैकेनिकल इंजीनियरिंग और रोबोटिक्स सहित विभिन्न विषयों का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने इन प्रौद्योगिकियों में देश की क्षमताओं को विकसित करने को आत्मनिर्भरता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।
प्रो. शुभ्रता गुप्ता ने कार्यक्रम के समन्वयकों के समर्पित प्रयासों की सराहना की। उन्होंने प्रतिभागियों को अनुसंधान, नवाचार और प्रौद्योगिकी विकास के माध्यम से भारत के विस्तारित होते अंतरिक्ष क्षेत्र में योगदान देने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने सहयोगात्मक कार्यशैली के महत्व को रेखांकित करते हुए सभी प्रतिभागियों को कार्यक्रम की सफलता के लिए शुभकामनाएं दीं।
मुख्य अतिथि डॉ. आर. एन. साहू ने एनआईटी रायपुर में पीएचडी में नए प्रवेश के लिए संस्थान को बधाई दी। उन्होंने मंगल अभियानों और चंद्रयान जैसे भारत के अंतरिक्ष अभियानों की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए प्रतिभागियों को अनुसंधान के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि कक्षा में प्राप्त ज्ञान के साथ व्यावहारिक परियोजनाओं, प्रयोगों और क्षेत्रीय कार्यों को जोड़ना आवश्यक है। उन्होंने प्रतिभागियों से अपने ज्ञान का उपयोग वास्तविक समस्याओं के समाधान में करने तथा वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति में योगदान देने का आग्रह किया।
धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए डॉ. हिमांशु गोविल ने निदेशक और समारोह में उपस्थित सभी गणमान्य अतिथियों के प्रति विशेष आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम के माध्यम से प्रतिभागियों को संबंधित क्षेत्रों में सक्रिय रूप से कार्य कर रहे वैज्ञानिकों के साथ संवाद करने और उनके अनुभवों से सीखने का मूल्यवान अवसर प्राप्त हो रहा है।
उद्घाटन सत्र के पश्चात डॉ. आर. एन. साहू द्वारा मुख्य व्याख्यान प्रस्तुत किया गया। उन्होंने ड्रोन प्रौद्योगिकी और कृषि क्षेत्र में इसके अनुप्रयोगों पर विस्तार से चर्चा की। अपने विद्यार्थी जीवन का एक प्रसंग साझा करते हुए उन्होंने बताया कि उनसे कभी एक सरल प्रश्न पूछा गया था—“ड्रोन क्या है?” इसके बाद उन्होंने इस क्षेत्र के तीव्र विकास की चर्चा की और बताया कि वर्ष 1916 से 1920 के बीच ड्रोन प्रौद्योगिकी के विकास में महत्वपूर्ण प्रगति हुई। उन्होंने ड्रोन शब्द का विस्तार “डायनेमिक रिमोटली ऑपरेटेड नेविगेशन इक्विपमेंट” बताया। साथ ही, उन्होंने रिमोट-कंट्रोल प्रणालियों के महत्व और ड्रोन के प्रमुख घटकों, जैसे ऊर्जा आपूर्ति, प्रणोदन तथा नेविगेशन प्रणाली, की जानकारी दी।
कृषि क्षेत्र में प्रौद्योगिकी के विकास को समझाते हुए डॉ. साहू ने 1960 और 1970 के दशक की हरित क्रांति तथा उसके बाद जीन क्रांति का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इन महत्वपूर्ण पड़ावों ने कृषि अनुसंधान को नई दिशा प्रदान की। वर्तमान समय में सटीक कृषि और स्मार्ट फार्मिंग में ड्रोन की भूमिका लगातार बढ़ रही है। उन्होंने जोर दिया कि इन तकनीकों की सफलता के लिए खेतों से व्यापक और सटीक जानकारी एकत्र करना आवश्यक है।
उन्होंने केरल में नारियल के बागानों की निगरानी के लिए थर्मल कैमरों और सेंसरों के माध्यम से रिमोट सेंसिंग के उपयोग का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि इस प्रकार की तकनीकों में उपयोग किए जाने वाले उपकरणों और सेंसरों की लागत 500 लाख रुपये तक हो सकती है। उन्होंने रेखांकित किया कि भारत को रिमोट सेंसिंग के क्षेत्र में 55 वर्षों से अधिक का अनुभव प्राप्त है।
डॉ. साहू ने जमीन पर, जमीन से ऊंचाई पर तथा हवा में सेंसर स्थापित करने की विभिन्न व्यवस्थाओं की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि सेंसर की ऊंचाई बढ़ने के साथ अधिक व्यापक क्षेत्र का अवलोकन किया जा सकता है। उन्होंने उपग्रह आधारित रिमोट सेंसिंग और मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी) आधारित रिमोट सेंसिंग के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि उपग्रह कम समय में पूरे शहर का सर्वेक्षण कर सकते हैं, लेकिन उनमें प्राप्त चित्रों का स्थानिक विभेदन सीमित हो सकता है। इसके विपरीत, यूएवी आधारित रिमोट सेंसिंग अधिक सटीक और विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराने में सहायक होती है।
उन्होंने यह भी बताया कि भारत के सभी बागानों का सर्वेक्षण करने के लिए विभिन्न दिनों में 2,60,000 से अधिक ड्रोन संचालित करने की आवश्यकता पड़ सकती है। ड्रोन आधारित डेटा संग्रह के प्रमुख लाभों में वास्तविक समय में जानकारी की उपलब्धता, कम लागत तथा उच्च स्थानिक, वर्णक्रमीय और कालिक विभेदन शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, इन तकनीकों के माध्यम से प्राप्त आंकड़ों को सरल और विश्लेषणात्मक प्रारूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, जिससे उनका उपयोग निर्णय लेने और कृषि प्रबंधन को बेहतर बनाने में किया जा सके।
इस सत्र में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि उभरती प्रौद्योगिकियां नवाचार और अनुसंधान के माध्यम से वास्तविक जीवन की चुनौतियों का समाधान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। ETSIS-2026 संकाय विकास कार्यक्रम का उद्देश्य अंतरविषयक सहयोग को बढ़ावा देना तथा अंतरिक्ष एवं अंतरग्रहीय प्रणालियों के क्षेत्र में प्रतिभागियों की विशेषज्ञता को सुदृढ़ करना है।








