
“स्थानीय प्रचुरता से सतत सामग्रियों और भविष्य के लिए तैयार वस्त्रों में वैश्विक नेतृत्व तक”
श्री गिरिराज सिंह

Raipur chhattisgarh VISHESH / फाइबर के साथ भारत का 5,000 बरस पुराना सभ्यतागत संबंध है, जो हमारे गाँवों, परंपराओं तथा सामूहिक पहचान में गहराई से गुँथा है। “बुनी हुई हवा” कहलाने वाली मोहनजोदड़ो की प्रसिद्ध मलमल से लेकर समस्ते महाद्वीपों तक फैली भारतीय कारीगरी तक — फाइबर हमेशा से हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा रहा है। आज, जब दुनिया वैश्विक स्थिरता की क्रांति की कगार पर खड़ी है, तब यही प्राचीन ज्ञान हमारी सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति है।
दशकों तक केले के पेड़ के तने को बेकार अपशिष्ट मानकर फेंक दिया जाता था। आज वही बायोमास प्रीमियम फाइबर बनकर निर्यात बाज़ारों की मांग पूरी कर रहा है, ग्रामीण आजीविकाओं को सशक्त बना रहा है और इस कृषि अवशेष को राष्ट्रीय आय में बदल रहा है। अपशिष्ट से समृद्धि तक, स्थानीय प्रचुरता से वैश्विक अवसर तक — यही भारत की न्यू एज फाइबर मुहिम का सार है, जो हरित सामग्रियों और भविष्य के लिए तैयार वस्त्रों में भारत को वैश्विक नेतृत्व की ओर अग्रसर कर रहा है।
न्यू एज फाइबर ऐसे टिकाऊ एवं पौधों-आधारित पदार्थ हैं, जो भारत के पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक नवाचार के साथ जोड़ते हैं। बांस, भाँग, केला, पीएएलएफ, फ्लैक्स, रेमी, सिसल, मिल्कवीड और कपोक जैसे फाइबर सदियों से मौजूद रहे हैं, लेकिन अब इन्हें वस्त्र उद्योग, रक्षा, बायोडिग्रेडेबल कंपोज़िट्स और प्रीमियम उत्पादों में उच्च-मूल्य उपयोगों के लिए नए सिरे से खोजा जा रहा है। ये हरित भविष्य के लिए भारत के प्राकृतिक फाइबर भंडार का विस्तार कर रहे हैं।
बढ़ती आय, वैश्विक स्थिरता संबंधी अनिवार्यताएँ और ट्रेसेबल सोर्सिंग की आवश्यकताएँ वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं को पूरी तरह बदल रही हैं और एक नई फाइबर अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ा रही हैं। उपभोक्ता अब अपने पहनने के कपड़ों में आराम, पसीना सोखने की क्षमता या ब्रीदेबिलिटी और टिकाऊपन चाहते हैं। यही महत्वकपूर्ण बदलाव भारत में फाइबर की खपत को आज के 15 एमएमटी से बढ़ाकर 2030 तक 23 एमएमटी तक ले जाने वाला है। दुनिया अब तेजी से वही तलाश रही है, जिसे भारत प्रदान कर सकता है : नैतिक, टिकाऊ और उच्च-प्रदर्शन वाले प्राकृतिक फाइबर, जो सदियों के अनुभव पर आधारित हैं।
इस विजन को एक स्पष्ट संस्थागत एवं नीतिगत ढाँचे का समर्थन प्राप्त है। वर्ष 2026–2031 के लिए 5,664 करोड़ रुपये के कुल परिव्यय वाले “मिशन फॉर कॉटन प्रोडक्टिविटी” के अंतर्गत न्यू एज फाइबर्स के लिए 300 करोड़ रुपये का विशेष प्रावधान रखा गया है। इस प्रयास को और सशक्त बनाते हुए, केंद्रीय बजट 2026–27 में घोषित राष्ट्रीय फाइबर मिशन एक व्यापक रणनीतिक ढाँचा प्रदान करता है, जो चार प्रमुख स्तंभों : कृषि-सूत्र- खेती और कच्चे माल के विकास के लिए, इन्फिनिटी-अनुसंधान एवं नवाचार के लिए, ग्राम-सेतु – अवसंरचना और उद्यम सृजन के लिए, तथा जीएमपीएस: ब्रांडिंग और बाज़ार विकास के लिए – पर आधारित है ।
इस नीतिगत ढाँचे की शक्ति दशकों से जारी वैज्ञानिक अनुसंधान में निहित है, जिसे ठोस परिणाम पहले से ही सामने आ चुके हैं। मिल्कवीड (आक/मदार) जिसे पारंपरिक रूप से भगवान शिव को अर्पित किया जाता है, नॉर्दर्न इंडिया टेक्सटाइल रिसर्च एसोसिएशन (एनआईटीआरए) में 18 वर्षों के अनुसंधान के बाद एक बड़ी कामयाबी के तौर पर सामने आया है। अब इसका उपयोग रक्षा क्षेत्र में, विशेषकर –20°C तापमान में कार्यरत सैनिकों के लिए स्लीपिंग बैग बनाने में किया जा रहा है। ये स्लीपिंग बैग अपने पॉलिएस्टर विकल्पों की तुलना में 10% हल्के, ऊन से अधिक गर्म तथा सीएलओ/सेल प्रमाणित हैं। 55 मिलियन हेक्टेयर बंजर भूमि पर बिना उर्वरक के उगाए जाने पर यह पौधा किसानों को प्रति एकड़ प्रतिवर्ष 1.5–2 लाख रुपये तक की आय प्रदान करने की क्षमता रखता है।
केले का फाइबर प्रतिवर्ष लगभग 1.8 मिलियन टन उत्पादन की क्षमता रखता है और कृषि अवशेषों से किसानों को अतिरिक्त आय प्रदान कर सकता है, जबकि बांस प्रति हेक्टेयर 60 टन तक बायोमास उत्पादन करने की क्षमता रखता है, जिससे पूर्वोत्तर भारत के लिए बड़े अवसर उत्पन्न हो रहे हैं। भाँग भी एक उभरता हुआ वैश्विक बाज़ार बन रहा है, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में जिसकी खेती की पहले से ही अनुमति है। फ्लैक्स, सिसल, रेमी, पीएएलएफ, बिछुआ या नेटल और कपोक जैसे फाइबरों के साथ मिलकर ये सभी भारत के टिकाऊ एवं प्राकृतिक फाइबर आधार का निरंतर विस्तार कर रहे हैं।
इस वैज्ञानिक गति को आगे बढ़ाते हुए,न्यू एज फाइबर्स पर राष्ट्रीय सेमिनार एक ऐसे मंच के रूप में उभरा, जहाँ विज्ञान, नीति और उद्यम एक साथ आ सके। इसने शोधकर्ताओं, वैज्ञानिकों, उद्यमियों, किसान संगठनों, उद्योग जगत के दिग्गकजों और नीति-निर्माताओं को एक ही मंच पर एकत्रित किया। सभी दस प्राथमिकता प्राप्त फाइबर्स को कवर करने वाले तीन कार्य बलों की रिपोर्टें जारी की गईं, जिन्होंने क्षेत्रीय विज्ञान को सीधे योजनाओं के डिज़ाइन और निवेश की प्राथमिकताओं में बदल दिया।
इस सेमिनार ने मानकों, प्रसंस्करण अवसंरचना और संस्थागत वित्तपोषण में मौजूद खामियों की भी स्पष्ट रूप से पहचान की , जो एक ऐसे मिशन को दर्शाता है जो केवल नीति नहीं, बल्कि वास्तविक क्रियान्वयन पर केंद्रित है। इसमें प्रमुख प्राथमिकताएँ: उत्पादन को पाँच वर्षों में 10,000 मीट्रिक टन से बढ़ाकर 10 लाख मीट्रिक टन तक पहुँचाना, गुणवत्ता मानकों का विकास करना, मशीनरी के स्वदेशीकरण को बढ़ावा देना, आयातित प्रसंस्करण तकनीक पर निर्भरता कम करना और खेती से लेकर मूल्य संवर्धन तक क्लस्टर आधारित फाइबर इकोसिस्टम का निर्माण करना सामने आईं। ये सभी कदम मिलकर न्यू एज फाइबर्स को ग्रामीण समृद्धि और टिकाऊ विकास के लिए एक संपूर्ण सरकारी मिशन बनाते हैं।
शायद सबसे परिवर्तनकारी कार्य फाइबर ब्लेंडिंग है। भारत की वास्तविक शक्ति किसी एक फाइबर में नहीं, बल्कि उन्हें समझदारी से संयोजित करने में निहित है—जैसे थर्मल हल्केपन के लिए मिल्कवीड, गर्माहट के लिए ऊन, ब्रीदेबिलिटी के लिए बांस, और कोमलता के लिए कपास। मिश्रित कपड़ा या ब्लेंडेड फैब्रिक कोई समझौता नहीं है; यह प्रदर्शन को उन्नत बनाना है – ऐसे कपड़े तैयार करना जो अधिक मजबूत, अधिक स्मार्ट और अधिक टिकाऊ हों, साथ ही बेहतर आराम, नमी सोखने की क्षमता, टिकाऊपन तथा फैशन, जीवनशैली और तकनीकी वस्त्रों में बहुपयोगिता प्रदान करें।
इसके लाभ पूरी मूल्य शृंखला में फैलते हैं। उपभोक्ताओं को बेहतर आराम और कार्यक्षमता मिलती है, निर्माताओं को प्रीमियम और विशिष्ट उत्पाद विकसित करने का अवसर मिलता है, और किसानों को विविध प्रकार की मांग तथा अधिक मजबूत आय प्राप्त होती है। भारत के लिए, ब्लेंडिंग या मिश्रण केवल एक तकनीकी नवाचार भर नहीं है; यह कच्चे फाइबर आपूर्ति से वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी, मूल्य-संवर्धित और भारतीय पहचान से जुड़े ब्रांड्स तक पहुँचने का एक सेतु है।
असल में, न्यू एज फाइबर मुहिम जीवन को रूपांतरित करने, किसानों के लिए अवसर सृजित करने, ग्रामीण आजीविकाओं को सशक्त बनाने, महिलाओं को सशक्त करने और उद्यमियों को स्थानीय संसाधनों से वैश्विक व्यवसाय खड़ा करने में सक्षम बनाने के बारे में है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्रक मोदी के 5एफ विज़न— खेत से फाइबर, कपड़े से फैशन और विदेश तक—से प्रेरित, भारत की ग्रीन फाइबर क्रांति कोई दूर का सपना नहीं है। रणनीति तय है, संस्थान सक्रिय हैं, विज्ञान प्रमाणित हो चुका है, और उद्यमी तैयार हैं। आज भारत जो कर रहा है—फाइबर दर फाइबर, मिश्रण दर मिश्रण, क्षेत्र दर क्षेत्र, और खेत दर खेत—अपनी वस्त्र गाथा का अगला महान अध्याय लिख रहा है।
(लेखक केंद्रीय वस्त्र मंत्री हैं। व्यक्त किए गए विचार व्यक्तिगत हैं)





















