






नदी पुनर्जीवन के लिए विकेन्द्रीकृत दृष्टिकोण आवश्यक : प्रो. तारे
रायपुर, 25 मार्च 2026।
Raipur chhattisgarh VISHESH राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) रायपुर के ‘महानदी नदी बेसिन प्रबंधन एवं अध्ययन केंद्र’ (सी-महानदी) द्वारा विश्व जल दिवस के अवसर पर “नदी बेसिन एवं जल प्रबंधन: चुनौतियाँ और अवसर” विषय पर एक संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में जल संसाधन विभाग, छत्तीसगढ़ के सचिव श्री राजेश सुकुमार टोप्पो उपस्थित रहे, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल (सीईसीबी) के सदस्य सचिव एवं आईएफएस अधिकारी श्री राजू अगासिमानी शामिल हुए। कार्यक्रम की अध्यक्षता एनआईटी रायपुर के निदेशक डॉ. एन. वी. रमणा राव ने की। इस अवसर पर राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के अधिकारी, विशेषज्ञ, संकाय सदस्य, शोधार्थी एवं विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
कार्यक्रम की शुरुआत सी-महानदी के सह-संयोजक डॉ. इश्तियाक अहमद के स्वागत उद्बोधन से हुई, जिसमें उन्होंने केंद्र की अब तक की गतिविधियों और उपलब्धियों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया।
संगोष्ठी का मुख्य आकर्षण आईआईटी कानपुर के एमेरिटस प्रोफेसर एवं ‘सी-गंगा’ के संस्थापक प्रमुख प्रो. (डॉ.) विनोद तारे का मुख्य व्याख्यान रहा। उन्होंने जिला नदी प्रबंधन योजनाओं (डीआरएमपी) के माध्यम से विकेन्द्रीकृत बेसिन प्रबंधन की आवश्यकता पर बल देते हुए जिलों को बेसिन प्रबंधन के liye, प्रभावी प्रशासनिक इकाई बताया।
प्रो. तारे ने कहा कि वर्तमान में नालों और नदी के संगम बिंदु पर अपशिष्ट जल उपचार की केंद्रीकृत व्यवस्था जल निकायों के पुनर्जीवन में प्रभावी नहीं है। इसके तहत सीवेज को लंबी दूरी तक पंप करना पड़ता है, जो महंगा होने के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन भी बढ़ाता है। इसके स्थान पर विकेन्द्रीकृत अवसंरचना विकसित करते हुए सीवेज और वर्षा जल को अलग-अलग रखने तथा उपयुक्त स्थानों पर सीवेज का उपचार करने की आवश्यकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि इससे न केवल शहर के नाले स्वच्छ रहेंगे और शहरी सौंदर्य में सुधार होगा, बल्कि सतही जल स्रोतों का पुनर्जीवन होगा, वे वर्ष भर जल से परिपूर्ण रहेंगे तथा स्थानीय स्तर पर जल चक्र पूर्ण होने से शहर का वॉटर रेजिलिएंस भी सुदृढ़ होगा।
भूमि और जल प्रबंधन के एकीकरण पर जोर देते हुए उन्होंने डीआरएमपी के माध्यम से जल संरक्षण एवं सतत उपयोग द्वारा जल सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कही। साथ ही “समर्थ गंगा” की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए नदी प्रवाह की गुणवत्ता और मात्रा दोनों के महत्व को रेखांकित किया तथा जैव विविधता को जल स्वास्थ्य का प्रमुख संकेतक बताया। उन्होंने एनआईटी जैसे ज्ञान केंद्रों की भूमिका को जागरूकता बढ़ाने और डेटा-आधारित निर्णय लेने में महत्वपूर्ण बताया।
विशिष्ट अतिथि श्री राजू अगासिमानी ने प्रो. तारे के विचारों की सराहना करते हुए मंडल स्तर पर योजना निर्माण और जिला स्तर पर प्रभावी क्रियान्वयन की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने जल निकायों की पारिस्थितिकी, जिसमें वनस्पति और जीव-जंतु शामिल हैं, के संरक्षण हेतु तार्किक उपचार मानकों की आवश्यकता को भी रेखांकित किया।
मुख्य अतिथि श्री राजेश सुकुमार टोप्पो ने युवाओं को संबोधित करते हुए “सीखना, भूलना और पुनः सीखना” की अवधारणा के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने जल प्रबंधन में विकेन्द्रीकृत दृष्टिकोण की आवश्यकता को स्वीकार करते हुए इसके स्थानीय जल निकायों और समग्र शहरी सौंदर्य पर सकारात्मक प्रभाव की सराहना की।
इससे पूर्व कार्यक्रम को संबोधित करते हुए निदेशक डॉ. एन. वी. रमणा राव ने सतत एवं समेकित जल संसाधन प्रबंधन की तत्काल आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने भूजल स्तर में गिरावट, जल गुणवत्ता में गिरावट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का उल्लेख करते हुए इनसे निपटने के लिए नवाचार, आधुनिक तकनीकों और सभी हितधारकों की सक्रिय भागीदारी को आवश्यक बताया।
कार्यक्रम का समापन डॉ. समीर बाजपेयी dwara सभी अतिथियों, वक्ताओं एवं प्रतिभागियों के प्रति धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ। उन्होंने आभार व्यक्त करते हुए संगोष्ठी में हुए विचार-विमर्श को ज्ञानवर्धक बताया तथा सभी हितधारकों के निरंतर सहयोग के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।









