

श्री गजेंद्र सिंह शेखावत
लेखक केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री हैं

Raipur chhattisgarh VISHESH / भारत में गंतव्य स्थलों की कभी कोई कमी नहीं रही है। कमी अगर रही है, तो बस उस संस्थागत परिकल्पना की, जिसके जरिये दुनिया इन स्थलों को जानने में सक्षम हो सके, वहाँ पहुँच सके, उन्हें अनुभव कर सके और सबसे ज़रूरी बात—वहाँ बार-बार जा सके।
हमारी सांस्कृतिक विरासत बेमिसाल है: यहाँ सब कुछ है – प्राचीन शहर और जीवंत परंपराएँ, पवित्र परिदृश्य और वन्यजीव, वास्तुकला और शिल्प, खान-पान और त्योहार, पहाड़ और समुद्र तट, आदि। लेकिन सिर्फ़ विरासत से ही पर्यटन नहीं बनता। कोई स्मारक अपने-आप में गंतव्य स्थल नहीं होता; एक गंतव्य स्थल असल में एक पूरा इकोसिस्टम होता है। इसमें शामिल हैं—वहाँ तक ले जाने वाली सड़क, यात्रा से जुड़ी कहानी, यात्रियों का स्वागत करने वाला आतिथ्य, उसे असली पहचान देने वाले कारीगर, उसे खोजने में मदद करने वाली तकनीक और वह समुदाय जिसकी भागीदारी यह तय करती है कि पर्यटन एक आर्थिक अवसर बनेगा या बस एक अनुचित प्रवेश रह जाएगा।
इसीलिए भारतीय पर्यटन के अगले अध्याय को सिर्फ़ पर्यटन स्थलों के नज़रिए से नहीं, बल्कि साझेदारी के नज़रिए से भी तय किया जाना चाहिए।
पर्यटन का पुरानी संरचना काफ़ी हद तक ऊपर से नीचे की ओर श्रेणीबद्ध थी। सरकारें अवसंरचना बनाती थीं, गंतव्य स्थलों को बढ़ावा दिया जाता था, उद्योग जगत पर्यटकों के आने-जाने और ठहरने की व्यवस्था करता था और समुदाय काफ़ी हद तक हाशिए पर रहते थे। नयी संरचना सबकी बराबर भागीदारी वाली होनी चाहिए। सरकार, उद्योग जगत, प्रौद्योगिकी कंपनियां, रचनाकार, निवेशक, राज्य, स्थानीय निकाय और समुदायों को मिलकर पर्यटन के अनुभव का निर्माण करना चाहिए।
यह फ़र्क सिर्फ़ शब्दों का नहीं है। यह विकास को समझने के हमारे नज़रिए में एक बुनियादी बदलाव को दिखाता है।
आज पर्यटन का मतलब सिर्फ़ लोगों का एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं है। यह विचारों, कहानियों, उम्मीदों, पूंजी और सांस्कृतिक प्रभाव का आवागमन है। यात्री अब सिर्फ़ भारत को देखना नहीं चाहते, बल्कि उसे अनुभव करना चाहते हैं — लोग खान-पान का स्वाद लेना, परंपराओं को समझना, घरों में जाना, कारीगरों से मिलना और यहाँ की जीवंत संस्कृति में, चाहे थोड़ी देर के लिए ही सही, भाग लेना चाहते हैं।
यह बदलाव भारत के लिए एक शानदार अवसर लेकर आया है।
लेकिन बिना तालमेल के अवसर का लाभ शायद ही मिल पाता है।
इसलिए सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है, भले ही यह बदलती रहती हो। इसकी ज़िम्मेदारी सब कुछ खुद करने की नहीं है; बल्कि ज़्यादा चीज़ों को संभव बनाने की है। सड़कों, हवाईअड्डों, रेलवे, स्वच्छता, डिजिटल अवसंरचना, विरासत संरक्षण और नागरिक सुविधाओं में सरकारी निवेश वह आधार तैयार करता है, जिस पर निजी क्षेत्र नवाचार और निवेश कर सकता है। राजनीतिक इच्छाशक्ति निरंतरता और दिशा देती है। उद्योग जगत पूंजी, प्रबंधन विशेषज्ञता, तकनीक और बाज़ार तक पहुंच में योगदान देता है। समुदाय वह चीज़ देते हैं, जिसे कोई सरकार या निगम नहीं बना सकता: प्रामाणिकता।
असली चुनौती इन क्षमताओं को एक साथ लाने की है।
उद्योग जगत के साथ पर्यटन मंत्रालय का बढ़ता जुड़ाव इसी दिशा में एक प्रयास है। ग्यारह रणनीतिक समझौता ज्ञापनों को अंतिम रूप दिया गया है, जिनमें से पांच का विश्व पर्यटन दिवस 2026 को आदान-प्रदान हुआ है। उनका महत्व केवल दस्तावेजों को लेकर नहीं है, बल्कि उन क्षमताओं में है, जिन्हें वे जोड़ना चाहते हैं – प्रौद्योगिकी, आवागमन, आतिथ्य, कंटेंट, डिजिटल आउटरीच और स्थानीय उद्यम।
गंतव्य स्थल की खोज करने के बदलते अर्थशास्त्र पर विचार करें।
एक पीढ़ी पहले, किसी यात्री को यात्रा गाइड या विज्ञापन के माध्यम से भारत की जानकारी मिलती होगी। आज, एक गंतव्य स्थल एक फिल्म, एक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म, एक रचनाकार की कहानी या मोबाइल फोन में सामने आई एक छवि के माध्यम से वैश्विक परिकल्पना में प्रवेश कर सकता है।
नेटफ्लिक्स के साथ सहयोग गंतव्य प्रचार की इस नई व्यवस्था को प्रदर्शित करता है, जो भारत की संस्कृति, वन्य जीवन और पहाड़ी परिदृश्यों को अंतरराष्ट्रीय दर्शकों के सामने दिखाती है। आईटीबी बर्लिन 2026 में प्रदर्शित भारत के स्वाद और लंदन व न्यूयॉर्क में प्रचार अभियान यह दर्शाते हैं कि कैसे पर्यटन का भूगोल; कहानी कहने के भूगोल से पहले ही महत्वपूर्ण हो जाता है।
लेकिन कहानी सुनाने से अंततः यात्रा करने का कारण अवश्य मिलना चाहिए।
यहीं पर अगली पीढ़ी की साझेदारी महत्वपूर्ण हो जाती है। मास्टरकार्ड के साथ विकसित परियोजना वाराणसी बहुमूल्य, विज्ञापन से परे एक ऐसे अनुभव की ओर बढ़ता है, जिसे वास्तव में खोजा और आरक्षित किया जा सकता है: सूर्योदय के समय गंगा, शास्त्रीय संगीत, साहित्य पर बातचीत, बनारसी बुनकर समुदाय और विरासत स्थल। इस तरह की पहल का महत्व यह है कि वाराणसी को फोटो खिंचवाने वाले स्मारक के रूप में नहीं, बल्कि अनुभव की जाने वाली सभ्यता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
इस अंतर की जानकारी हमारी संपूर्ण पर्यटन रणनीति को दी जानी चाहिए।
भारत को आकर्षण बेचने के बदले अनुभव संग्रहित करने की ओर बढ़ना चाहिए।
हवाई संपर्क भी इस व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। एलायंस एयर, एयर इंडिया और इंडिगो के साथ साझेदारी अतुल्य भारत को यात्री इकोसिस्टम में विस्तार देती है, जिससे उड़ानों, डिजिटल प्लेटफार्मों और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में गंतव्य को बढ़ावा मिलता है।
प्रौद्योगिकी एक और आयाम जोड़ती है: बुद्धिमत्ता।
भविष्य की पर्यटन प्रणाली को तेजी से समझना होगा कि कौन यात्रा कर रहा है, यात्री क्या चाहते हैं, मांग कहां उभर रही है और प्राथमिकताएं कैसे बदल रही हैं। गूगल इंडिया के साथ सहयोग, जिसमें क्षमता निर्माण और वैश्विक यात्रा मांग व यात्री व्यवहार को समझने से जुड़े कार्य शामिल है, एक पर्यटन नीति की ओर इशारा करता है, जो उत्तरोत्तर अधिक साक्ष्य-आधारित बन सकती है।
फिर भी सबसे परिणामी परिवर्तन पारंपरिक पर्यटन केंद्रों से बहुत दूर हो सकता है।
यदि पर्यटन को वास्तव में समावेशी बनाना है, तो गाँव को पर्यटन नीति के लिए उतना ही महत्वपूर्ण बनाना होगा जितना कि महानगरीय प्रवेश द्वार। होमस्टे, होटल जैसा ही महत्वपूर्ण हो सकता है। कारीगर उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है जितना आकर्षण। स्थानीय उद्यमी बड़े संचालकों के समान ही महत्वपूर्ण बन सकते हैं।
एयरबीएनबी, सोल ऑफ इंडिया और मेकमाईट्रिप की साझेदारियां अवसर के इसी लोकतंत्रीकरण की दिशा में प्रयास कर रही हैं – होमस्टे मेजबानों को डिजिटल क्षमताओं से लैस करना, कम-ज्ञात गंतव्यों को अधिक दृश्यता देना, अनजान गांवों को रचनाकारों और आरक्षण योग्य रहने की जगहों से जोड़ना। इसके पीछे एक गहरी सोच है: जब कोई स्थल किसी यात्री की कल्पना में बसता है, तो उससे पैदा होने वाले आर्थिक मौके उन लोगों की ज़िंदगी में भी आने चाहिए, जो उस स्थल को पहचान देते हैं।
यही पर्यटन से होने वाले विकास की असली कसौटी है।
सिर्फ़ आने वाले पर्यटकों की संख्या ही सफलता का पैमाना नहीं हो सकती। हमें एक और ज़रूरी सवाल पूछना चाहिए: जब कोई स्थल सफल होता है, तो फ़ायदा किसे होता है?
क्या कारीगर ज़्यादा कमाता है? क्या युवा को स्थानीय स्तर पर कोई अवसर मिलता है? क्या महिला उद्यमी को बाज़ार मिलता है? क्या समुदाय को अपनी सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को बचाने का प्रोत्साहन मिलता है? क्या यात्री सिर्फ़ एक फ़ोटो लेकर नहीं, बल्कि गहरी समझ लेकर वापस जाता है?
अगर इन सवालों का जवाब ‘हाँ’ में है, तो पर्यटन सिर्फ़ एक उद्योग नहीं रह जाता। यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सबके लिए आर्थिक विकास का ज़रिया बन जाता है।
इस मामले में भारत की कम जानी-पहचानी जगहें एक बहुत बड़ा मौका देती हैं। तकनीक उन्हें युवा दर्शकों तक पहुँचा सकती है; आवाजाही की सुविधा से वहाँ पहुंचना आसान हो सकता है; निजी निवेश उचित अवसंरचना बना सकता है; और समुदाय की भागीदारी यह सुनिश्चित कर सकती है कि विकास पहचान की कीमत पर न होता हो। हिमालय में समुदाय के नेतृत्व वाले विरासत पर्यटन को बढ़ावा देने वाली पहल – जिसमें मौखिक परंपराओं, शिल्प और स्थानीय ज्ञान का दस्तावेज़ीकरण शामिल है – यह दिखाती हैं कि पर्यटन कैसे संरक्षण का दुश्मन नहीं, बल्कि साथी बन सकता है।
लेकिन साझेदारी का मतलब सिर्फ़ समझौते पर दस्तख़त करने वाली सरकारी शब्दावली नहीं होनी चाहिए।
समझौता ज्ञापन तो बस एक शुरुआत है। असली साझेदारी तब शुरू होती है जब समझौते से कोई उत्पाद बनता है, जब किसी अभियान से यात्री आते हैं, जब यात्री से स्थानीय आय होती है और जब उस आय से उस जगह पर समुदाय का मालिकाना हक़ और मज़बूत होता है।
इसलिए उद्योग संघ और पर्यटन व्यापार बहुत ज़रूरी हैं। बाज़ार, यात्रियों, यात्रा-कार्यक्रमों और वितरण के बारे में उनकी जानकारी आकांक्षाओं को वास्तविक यात्राओं में बदल सकती है। वहीं, राज्य और स्थानीय संस्थाएँ ज़मीनी स्तर पर अनुभव की गुणवत्ता तय करती हैं।
भारतीय पर्यटन का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम सरकार और उद्योग जगत, केंद्र और राज्यों, तकनीक और परंपरा, वैश्विक प्लेटफ़ॉर्म और स्थानीय समुदायों के बीच की पुरानी संस्थागत सीमाओं को कितना खत्म कर पाते हैं।
वाराणसी इस संभावना की एक झलक दिखाती है: कहानी सुनाना, संगीत, विरासत, बुनाई, आतिथ्य और तकनीक – ये सब एक ही जगह पर संयोजित हो रहे हैं।
इससे मिलने वाला बड़ा सबक स्पष्ट है।
भारत को सिर्फ़ और पर्यटकों की ज़रूरत नहीं है। इसे एक मज़बूत पर्यटन समाज की ज़रूरत है।
एक ऐसा समाज, जहाँ नागरिक पर्यटन को किसी अन्य का उद्योग नहीं, बल्कि एक ऐसा मौका मानते हैं जिसमें उनकी भी हिस्सेदारी है। एक ऐसा समाज, जहाँ सरकारी निवेश से आधार बनता है, निजी निवेश संभावनाओं को कई गुना बढ़ाता है और समुदाय की भागीदारी से विकास को मान्यता मिलती है।
इसलिए, भविष्य का पर्यटन स्थल केवल नक्शे पर चिह्नित कोई जगह नहीं होगी। यह रिश्तों का एक नेटवर्क होगा।
और भारत की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त शायद सिर्फ़ इस बात में नहीं है कि हमारे पास क्या भव्य स्थल हैं, बल्कि इस क्षमता में है कि हम उन अनेक लोगों और संस्थाओं को एक साथ ला सकें, जो हमारी विरासत को दुनिया के लिए एक मूल्यवान अनुभव में बदल सकें।
अब हमारे सामने यह सवाल नहीं है कि क्या भारत के पास यात्रियों को देने के लिए पर्याप्त चीज़ें हैं।
निश्चित रूप से हैं।
सवाल यह है कि क्या हम ऐसी साझेदारियाँ बना सकते हैं जिनसे यह सुनिश्चित हो सके कि भारत की हर यात्रा उसकी सभ्यता की यात्रा बन जाए — और उस यात्रा से होने वाली समृद्धि उन लोगों तक पहुँचे जो उस सभ्यता को जीवित रखे हुए हैं।
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