
लक्ष्मी पुरी
लेखिका संयुक्त राष्ट्र की पूर्व सहायक महासचिव और यूएन विमेन की पूर्व उप कार्यकारी निदेशक हैं

Raipur chhattisgarh VISHESH / उन्होंने स्वयं को एक अत्यंत बेहतरीन संकट-प्रबंधक के रूप में प्रमाणित किया है। केवल उनके दृढ़ संकल्प, साहस और सावधानीपूर्वक की गई कार्रवाई के बल पर ही 1.4 बिलियन भारतीयों का महामारी जैसी सदी की भीषणतम आपदा से सुरक्षित निकालना तथा उस आपदा को अवसर में बदलना संभव हुआ। वह अब भारत का नेतृत्व ऐसे समय में कर रहे हैं, जब वैश्विक भूराजनीतिक और भू-आर्थिक व्यवस्था खतरनाक उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है।
पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी भारत के इतिहास में सबसे लंबे समय तक लगातार पद पर रहने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बन गए। यह उपलब्धि उनकी भी है और भारत की भी: उनसे पहले किसी ने भी इस लोकतंत्र में लगातार इतने लंबे समय तक शासन नहीं किया और न ही इतनी प्रतिस्पर्धी राजनीति के बीच किसी ने लगातार तीन बार चुनावी जीत हासिल की है। हालाँकि, रिकॉर्ड से अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने क्या कार्य किया है : अपने कार्यकाल के “प्रत्येक मिनट” के पूरे “साठ सेकेंड का भारत के लिए पूरी ऊर्जा के साथ उपयोग करते हुए उसे सार्थक बनाया”, उनके इन बारह वर्षों का प्रत्येक वर्ष 365 दिनों की उपलब्धियों से चिह्नित रहा, और इसी दौरान उस नए, गतिशील भारत का निर्माण हुआ, जिसे आज दुनिया एक अलग नजरिए से देख और समझ रही है।
मैंने अपनी कामकाजी ज़िंदगी फील्ड में, राजधानियों में, बोर्ड और कॉन्फ्रेंस रूम में तथा संयुक्त राष्ट्र में बितायी है—जहाँ देशों के बारे में दुनिया अपनी राय कायम करती है। बीते एक दशक जो परिवर्तन आया है, वह मेरे द्वारा देखे गए परिवर्तनों में सबसे अधिक उल्लेखनीय है: भारत के प्रति पहले जो उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण हुआ करता था, उसकी जगह अब प्रतिस्पर्धी रुचि, सीखने की इच्छा ने ले ली है, दुनिया भारत के उस परिवर्तन को विस्मय से देख रही है, जिसमें वह एक ‘सिद्धांतों के आधार पर आपत्ति दर्ज करने वाले’ और ‘व्यवस्था को स्वीकार करने वाले’ देश की जगह अब ‘व्यवस्था को आकार देने वाले’ देश के रूप में उभरा है, आज भारत बहुआयामी कूटनीतिक सहभागिता और रणनीतिक दृढ़ता के साथ आगे बढ़ रहा है। वह न केवल अपने प्रभाव का उपयोग अपने विचारों के समर्थन में कर रहा है, बल्कि अपने विचारों के समर्थन को भी शक्ति में परिवर्तित कर रहा है।
दुनिया इस शख्सियत का सही आकलन करती है: उन्हें सत्ता विरासत में नहीं मिली; उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सर्वोच्च पद तक का सफर बिना किसी पारिवारिक नाम के सहारे, रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर बीते बचपन से तय किया; उन्होंने भारत के कोने-कोने की यात्रा की, लोगों को समझा, उनके साथ बैठकर भोजन किया, उनके सुख-दुःख में भागीदार बने और जमीनी स्तर से अपना राजनीतिक जीवन निर्मित किया। वंशानुगत सत्ता और विशेषाधिकार प्राप्त उत्तराधिकार से ऊब चुकी दुनिया में, ऐसे नेता की छवि अधिक भरोसेमंद होती है, जिन्होंने अपनी पहचान स्वयं गढ़ी हो। वह भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने देश की सभ्यतागत पहचान को अपनी पहचान के रूप में धारण किया है, न कि उसके प्रति क्षमायाचना का भाव रखा है अथवा विदेशी वेशभूषा और दृष्टिकोण अपनाकर स्वयं को किसी अन्य रूप में प्रस्तुत किया है।
वैश्विक जनमत का आकलन करने वाले सर्वेक्षण इस बात से सहमत है: वर्षों से श्री मोदी लोकतांत्रिक नेताओं की मॉर्निंग कंसल्ट रैंकिंग में शीर्ष स्थान पर बने हुए हैं, उनकी स्वीकृति दो-तिहाई से अधिक रही है, जो पश्चिमी नेताओं से काफी आगे है। प्यू के सर्वेक्षणों के अनुसार, दस में से आठ भारतीय उनके प्रति अनुकूल दृष्टिकोण रखते हैं, और वे अपने देश की दिशा से अधिकांश परिपक्व लोकतंत्रों की तुलना में अधिक संतुष्ट हैं। सरकारें इस बात से सहमत हैं : उन्होंने 19 विदेशी संसदों को संबोधित किया है और लगभग 30 देशों के राजकीय सम्मान प्राप्त किए हैं, जिनमें से कई उन देशों के सर्वोच्च नागरिक सम्मान हैं।
अपने लोगों से वह सीधे संवाद करते हैं, हर महीने ‘मन की बात’ के माध्यम से अपने मन और हृदय की बात खुलकर रखते हैं; जबकि अन्य देशों के नेताओं के साथ उनका व्यवहार ऐसा है, जिसने वाशिंगटन और मॉस्को, खाड़ी देशों और यूरोप—सबको एक साथ किसी अद्भुत ‘जादुई प्रभाव’ के साथ जोड़कर रखा है।
भारत अब मॉडल आयात करने के बजाय उन्हें निर्यात कर रहा है। उसकी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना दुनिया के लगभग आधे रियल-टाइम भुगतान को संचालित करती है और लाखों खातों तक कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाती है। आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, एक दशक में 25 करोड़ लोग गरीबी के चंगुल से बाहर आए हैं: ‘अंत्योदय’, जो राज्य के संचालन का आधारभूत सिद्धांत है, केवल एक नारा भर नहीं, बल्कि ऐसा सिद्धांत है, जो सुनिश्चित करता है कि कोई भी पीछे न छूटे और सबसे पीछे खड़े व्यक्ति तक पहले सहायता पहुँचे, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र के ‘एजेंडा 2030’ ने भी आह्वान किया है। यदि किसी नेता ने इस सिद्धांत के अनुरूप वास्तव में शासन किया है, तो वह प्रधानमंत्री मोदी हैं। महामारी के दौरान भारत ने 2 बिलियन से अधिक टीके लगाए, 800 मिलियन लोगों को मुफ्त अनाज उपलब्ध कराया, लगभग 100 देशों को वैक्सीन और 150 देशों को दवाएँ उपलब्ध कराईं। संयुक्त राष्ट्र ने उन्हें ‘चैंपियन ऑफ द अर्थ’ के रूप में नामित किया, जबकि गेट्स फाउंडेशन ने गरीबी, भूख, स्वास्थ्य, लैंगिक समानता, ऊर्जा और जलवायु में मापनीय प्रगति के लिए उन्हें सतत विकास लक्ष्यों के ‘ग्लोबल गोलकीपर’ के रूप में नामित किया; यूनिसेफ और यूएन विमेन ने भी महिलाओं और लड़कियों के सशक्तिकरण से संबंधित उनके प्रयासों की सराहना की है, जिनमें ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण जैसी पहलें शामिल हैं।
उनके लक्षित और बहु-क्षेत्रीय कार्यक्रम महिलाओं और लड़कियों के जीवन में —घर से कॉलेज तक, छोटे कियोस्क से कॉर्पोरेट जगत तक, स्थानीय शासन से संसद तक संरचनात्मक बदलाव लाए हैं। उन्होंने महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास को नैतिक और सामाजिक न्याय की अनिवार्यता के रूप में आगे बढ़ाया है, जो देश की आधी आबादी की क्षमता को सक्रिय करने के लिए अपरिहार्य है। कोई भी राष्ट्र सशक्त महिलाओं के बिना आगे नहीं बढ़ सकता; भारत अब इस सत्य को एक महाद्वीप-स्तरीय व्यापकता के साथ लागू कर रहा है।
उन्होंने भारतीयों के भीतर ‘भारतीय होने’ का गर्व पुनः स्थापित किया है—देश के भीतर भी और दुनिया भर में फैले 3.5 करोड़ प्रवासी भारतीयों में भी – जो विश्व का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय है। राष्ट्र एकजुट होकर आगे बढ़ा है: महामारी के दौरान सामूहिक संकल्प में, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद सशस्त्र बलों के समर्थन में, और महाकुंभ में, जहाँ 60 करोड़ से अधिक श्रद्धालु मानव इतिहास के सबसे बड़े समागम का हिस्सा बने। ये सभी प्रतीक समाज को एक सूत्र में बाँधने वाली बातों को दर्शाते हैं: राष्ट्रपति भवन में जनजातीय महिला; क्षेत्र-दर-क्षेत्र उनका पगड़ी, टोपी या जनजातीय लोगों के पारंपरिक सिरोभूषण को सम्मान और स्नेह के साथ धारण करना; ‘मन की बात’ और पद्म पुरस्कारों के माध्यम से गाँवों के लोगों को नायक बनाना; आज़ादी के अमृत महोत्सव के तहत 200 मिलियन घरों में तिरंगे का फहराना; ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष का उत्सव; स्वच्छ भारत अभियान के तहत 110 मिलियन शौचालयों का निर्माण,जो एक जन-आंदोलन बना; और एक भारत, विविधता को एक सूत्र में पिरोते हुए हर क्षेत्र का सम्मान किया गया है।
मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने भारत की अग्रणी शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा को स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त किया और उसे व्यवहार में भी उतारा है: सैन्य और आर्थिक शक्ति, परमाणु और अंतरिक्ष क्षमताएँ, वैश्विक व्यवस्थाओं में निर्णायक भूमिका तथा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं में नियमों, मानकों और नीतियों को प्रभावित करने की क्षमता, उद्देश्यपूर्ण ढंग से निर्मित और सफलतापूर्वक विकसित किया गया कूटनीतिक, अनुसंधान एवं विकास और तकनीकी संसाधनों का मजबूत आधार, साथ ही भारत की सॉफ्ट पावर को पहले से कहीं अधिक प्रभावी रूप में प्रस्तुत किया गया है। यद्यपि वैश्विक स्तर पर वह संवाद के माध्यम से शांति और सुरक्षा के पक्षधर है, लेकिन आतंकवाद के मुद्दे पर —उरी से लेकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ तक—उनकी ‘कतई बर्दाश्त न करने की नीति’ है।
सबसे बढ़कर, उन्होंने स्वयं को एक अत्यंत बेहतरीन संकट-प्रबंधक के रूप में प्रमाणित किया है। केवल उनके दृढ़ संकल्प, साहस और सावधानीपूर्वक की गई कार्रवाई के बल पर ही 1.4 बिलियन भारतीयों का महामारी जैसी सदी की भीषणतम आपदा से सुरक्षित निकालना तथा उस आपदा को अवसर में बदलना संभव हुआ; मैं यह सोचकर सिहर उठती हूँ कि यदि वह नेतृत्वकारी भूमिका में न होते, तो क्या स्थिति होती। वह अब भारत का नेतृत्व ऐसे समय में कर रहे हैं, जब वैश्विक भूराजनीतिक और भू-आर्थिक व्यवस्था खतरनाक उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है, दो बड़े युद्ध चल रहे हैं और प्रमुख शक्तियाँ आत्मकेंद्रित रुख अपना रही हैं। इसके बावजूद वे भारत को शांत और स्थिर बनाए रख रहे हैं, उसकी ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा कर रहे हैं, और उसे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं।
चमत्कार यह है कि वह दुनिया के सबसे अधिक जनसंख्या वाले, युवा-प्रधान, जटिल, संघीय और आंतरिक रूप से प्रतिस्पर्धी लोकतंत्र को बदलने का साहस रखते हैं—ऐसा लोकतंत्र जो कई तरह के वीटो-शक्ति रखने वालों, निहित स्वार्थों और संकीर्ण दृष्टिकोण वालों, राष्ट्र-विरोधी विपक्षी नेताओं से भरा हुआ है, जो अराजकता की साजिश रचते हैं, विदेशी सूचना हेरफेर और हस्तक्षेप को न्यौता देते हैं और महत्वपूर्ण सुधारों को बाधित करते हैं।
वैश्विक स्तर पर यह परिवर्तन केवल स्थिति में ही नहीं, बल्कि व्यवहार और दृष्टिकोण में भी दिखाई देता है। भारत अब सम्मेलन आयोजित करता है, जबकि पहले वह केवल प्रतिभागी होता था, और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’—‘पूरा विश्व एक परिवार है’—अब केवल एक नारा भर नहीं, बल्कि उपलब्धियों के रूप में साकार हुआ सिद्धांत बन गया है। भारत विश्व का लघु-प्रतिरूप भी है और व्यापक रूप भी: वह अपने भीतर जो समस्याएँ हल करता है, वही समाधान पूरी दुनिया के लिए प्रमाणित करता है और वैश्विक सार्वजनिक कल्याण के रूप में प्रस्तुत करता है। इसकी डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना को ग्लोबल साउथ और ग्लोबल नॉर्थ दोनों में साझा किया जा रहा है; इसके जी-20 नेतृत्व के दौरान अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्यता मिली; यह अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन का नेतृत्व करता है; इसके ‘पंचामृत’ जलवायु संकल्प ‘मिशन लाइफ़’ के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक विरासत की भावना से जुड़े हुए हैं। भारत ने विकासशील देशों का पहला ग्लोबल एआई समिट आयोजित किया; चौथी औद्योगिक क्रांति में, जैसे चंद्रमा पर मिशन के संदर्भ में, अब भारत केवल अनुगामी नहीं रहा, बल्कि अग्रणी भूमिका निभा रहा है और अपने समाधान पूरी दुनिया के लिए प्रस्तुत कर रहा है।
इस कालखंड की सबसे विशेष बात यह है कि भारत ने अपनी महत्वाकांक्षा को खुलकर व्यक्त किया है: वह भारत और दुनिया को बताते हैं कि यह भारत की सदी होगी। हमारी अर्थव्यवस्था विश्व की दसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुकी है; लक्ष्य स्पष्ट रूप से घोषित है—‘ विकसित भारत’ 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना, जो स्वतंत्रता के सौ वर्ष पूरे होने का वर्ष होगा। आधुनिकता और विरासत को एक ही उत्तराधिकार के रूप में देखा जा रहा है, न कि परस्पर प्रतिस्पर्धी दावों के रूप में। सभ्यतागत स्थलों का पुनरुद्धार, प्राचीन धरोहरों की पुनर्प्राप्ति और ‘भारत’ नाम की पुनः प्रतिष्ठा : ये सब केवल अतीत की स्मृति नहीं हैं। ये दावा करते हैं कि 5,000 वर्ष से अधिक पुरानी सभ्यता को अपना आत्म-सम्मान और महानता किसी और से उधार लेने की आवश्यकता नहीं है।
जिस दुनिया को मैंने अपने करियर के दौरान देखा, वह भारत को उसकी अपनी अधूरी संभावनाओं के आधार पर आंकती थी। लेकिन इस दशक में भारत ने स्वयं को अब ‘गंतव्य भारत’ के आधार पर आंकना शुरू कर दिया है। इस नेतृत्व के लिए सबसे मजबूत तर्क अभी आगे है: भारत पृथ्वी पर मानव विकास, प्रयास और पूर्णता की सबसे विशाल प्रयोगशाला है, जिसका कार्य अत्यंत व्यापक है और अभी अधूरा है—इसी कारण इतने बड़े देश को ऐसे नेतृत्व की आवश्यकता है। उन्होंने सबसे लंबे समय तक पद संभाला है; वह सबसे अलग दिखाई देते हैं; उनका रिकॉर्ड असाधारण है। अब जो बाकी है, वह भारत शताब्दी का जनादेश है।





















