घायल मजदूर के मुआवजे में 6 गुना बढ़ोतरी, अदालत ने 95 हजार से 6.7 लाख रुपए किया
25 प्रतिशत दिव्यांगता को माना आधार… कोर्ट ने माना कि घायल व्यक्ति को गंभीर चोटें आई और वह लंबे समय तक काम करने में असमर्थ रहा। कोर्ट ने हरियाणा की न्यूनतम मजदूरी (करीब 4,000 रुपए प्रतिमाह) के आधार पर आय का आकलन किया। अदालत ने 6 महीने की आय हानि, 25 प्रतिशत स्थायी दिव्यांगता और भविष्य को कमाई पर पड़े असर को ध्यान में रखते हुए मुआवजा बढ़ाया।


पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सड़क दुर्घटना में घायल व्यक्ति की बाद में मृत्यु हो जाने मात्र से मुआवजे का दावा स्वतः समाप्त नहीं हो जाता। यदि दुर्घटना के कारण चोटें आई थीं और उसके आधार पर दावा दायर किया गया था, तो पीड़ित के विधिक वारिस उस दावे को आगे बढ़ा सकते हैं।
न्यायालय ने कहा कि मुआवजा दावा एक वैधानिक अधिकार है, जो दुर्घटना से उत्पन्न कारण पर आधारित होता है। इसलिए पीड़ित की मृत्यु के बाद भी उसके आश्रितों को न्याय से वंचित नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि दावा निरस्त करने से पहले यह देखना आवश्यक है कि मृत्यु दुर्घटना से संबंधित थी या नहीं, तथा कानून के अनुसार वारिसों को कार्यवाही में प्रतिस्थापित किया जा सकता है।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने दावा खारिज करने के आदेश को अनुचित ठहराते हुए मामले को विधि अनुसार आगे बढ़ाने के निर्देश दिए।
चंडीगढ़ सड़क दुर्घटना में घायल एक मजदूर को बड़ी राहत देते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने उसका मुआवजा 06 गुना से अधिक बढ़ाकर 95 हजार रुपए से 6.7 लाख रुपए कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल दस्तावेजों की कमी के आधार पर पीड़ित को उचित मुआवजा देने से इनकार नहीं किया जा सकता।
जस्टिस हरकेश मनुजा ने फैसले में कहा कि असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के पास अक्सर आय के लिखित प्रमाण नहीं होते, ऐसे में अदालत को व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। मामला वर्ष 2005 की सड़क दुर्घटना से जुड़ा है, जिसमें मेवात निवासी 56 वर्षीय मजदूर आलम गंभीर रूप से घायल हो गया था। हादसे के बाद वह करीब 6 महीने तक बिस्तर पर रहा। मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने 2008 में उसे मात्र 95 हजार रुपए का मुआवजा दिया था। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि केवल दस्तावेजी साक्ष्य के अभाव में उचित मुआवजा देने से इनकार नहीं किया जा सकता। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के पास अक्सर आय के पुख्ता कागजात नहीं होते, इसलिए ऐसे मामलों में न्यायालय को व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने मुआवजा राशि बढ़ाते हुए पीड़ित को राहत प्रदान की।





















