

PM Statement on Naxalism
Raipur chhattisgarh VISHESH आज मैं आपको एक और ऐसे विषय पर लेकर जाना चाहता हूं…
जो देश की सुरक्षा के हिसाब से तो बड़ा है ही…
ये हमारे नौजवानों के भविष्य से भी जुड़ा हुआ है।
ये विषय नक्सलवाद का है…
अब समझता हूँ ये नक्सलवाद शब्द ऐसे ही लोगों ने लटका दिया है, हकीकत में ये माओवादी आतंक का है। ये माओवादी आतंकी कथा मैं सुनना आज चाहता हूं
कांग्रेस के शासन में जो अर्बन नक्सलों का जो इकोसिस्टम है…
ये जो अर्बन नक्सल्स है…
वो कुछ इस कदर हावी थे, आज भी हैं, कि माओवादी आतंक का कोई भी घटना देश के लोगों तक न पहुंचे इसके लिए वो बहुत बड़ी सेंसरशिप चलाते रहते हैं वो।
हमारे देश में आतंकवाद की इतनी चर्चा होती थी।
आर्टिकल 370 पर डिबेट होती थी।
लेकिन हमारे शहरों में जो कांग्रेस के राज में पनपे हुए अर्बन नक्सली बैठे थे…
जो ऐसी संस्थानों पर कब्जा करके बैठे थे…
वो माओवादी आतंक पर पर्दा डालने का काम करते थे। देश को अंधेरे में रखते थे।
अभी कुछ दिन पहले भी माओवादी आतंक के कई पीड़ित दिल्ली आए थे।
ये बड़ी दर्दनाक चीज है। बहुत बड़ी मात्रा में आए थे। किसी की टांग नहीं थी, किसी का हाथ नहीं था, किसी की आंख नहीं थी….शरीर के अंग कुछ चले गए थे। ये माओवादी आतंक के शिकार लोग थे। गांव के गरीब, आदिवासी, भाई बहन, किसान के बेटे थे। माताएं बहने थी, दो दो पैर कट चुके थे।
वो दिल्ली में आए थे, 7 दिन रहे…हाथ पैर जोड़ के कह रहे थे कि हमारी बात हिंदुस्तान के लोगों तक पहुंचाइए ….प्रेस कॉन्फ्रेंस किया उन्होंने, आप में से किसी ने देखा नहीं होगा सुना नहीं होगा।
ये माओवादी आतंक के ठेकेदार जो बैठे हैं ना उन्होंने उस जुल्म के शिकार हुए, उनके दर्द की कथा भी हिंदुस्तान के लोगों तक नहीं पहुंचने दी।
कांग्रेस के इकोसिस्टम ने इसकी बहुत चर्चा ही नहीं होने दी।
साथियों,
हालात ऐसे थे कि देश का करीब-करीब हर बड़ा राज्य नक्सली हिंसा..माओवादी आतंक की चपेट में था।
बाकी देश में संविधान लागू था…लेकिन रेड कॉरिडोर में संविधान का कोई नाम लेने वाला नहीं था।
और मैं बहुत जिम्मेवारी से कहता हूं कि जो लोग माथे पे संविधान की किताब लगाते हैं न वे आज भी ये माओवादी आतंकियों जो संविधान को नहीं मानते हैं इनकी रक्षा के लिए दिन रात लगा देते हैं।
साथियों,
सरकार तो चुनी जाती थी…लेकिन रेड कॉरिडोर में उसकी कोई मान्यता नहीं होती थी।
शाम ढलती थी..तो घर से बाहर निकल पाना मुश्किल हो जाता था।
जो जनता को सिक्योरिटी देने वाले लोग थे…
उनको भी सिक्योरिटी लेकर चलना पड़ता था।
साथियों,
बीते 50-55 सालों में इस माओवादी आतंक की वजह से हजारों लोग मारे गए…
कितने ही सुरक्षाकर्मी माओवादी आतंक का शिकार बने…
कितने ही नौजवानों को हमने खोया…
ये नक्सली, ये माओवादी आतंकी स्कूल नहीं बनाने देते थे।
अस्पताल नहीं बनाने देते थे।
अस्पताल है तो डॉक्टर को घुसने नहीं देते थे
जो बने हुए थे, उनको भी बम से उड़ा दिया जाता था।
दशकों-दशक तक विकास की रोशनी से देश का एक बहुत बड़ा हिस्सा, बहुत बड़ी आबादी वंचित रही।
इसका बहुत बड़ा नुकसान हमारे आदिवासी भाई बहनो को, दलित भाई-बहनों को गरीब लोगों को उठाना पड़ा।
साथियों,
माओवादी आतंक, देश के नौजवानों के साथ बहुत बड़ा अन्याय है, बहुत बड़ा पाप है।
मैं देश के नौजवान को इस हाल में नहीं छोड़ सकता था।
मैं बेचैनी महसूस करता था, जबान पे ताला लगा के बैठा था, आज पहली बार मेरे दर्द को आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं। मैं उन माताओं को जानता हूं जिन्होंने अपने लाल खोए हैं। उन माताओं की अपने लाल से कुछ अपेक्षाएं थी। या तो वो ये माओवादी आतंकियों के झूठे बातों में फंस गए या तो माओवादी आतंक का शिकार हो गए।
और इसलिए, 2014 के बाद हमारी सरकार ने… पूरी संवेदनशीलता के साथ भटके हुए नौजवानों को मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया।
और मै देशवासिओ को पहली बार कह रहा हूँ, देशवासिओ को संतोष होगा , देशवासी हमें आशीर्वाद देंगे, जिन माताओ ने अपने लाल खोये वो माताएँ हमें आशीर्वाद देंगी, देश की शक्ति को आषीर्वाद देंगी |
और आज देश उसके नतीजे देख रहा है।
11 वर्ष पहले तक देश के सवा सौ जिले, 125 से ज़्यादा, माओवादी आतंक से प्रभावित थे।
और आज ये संख्या सिर्फ 11 जिलों तक सिमट गई है।
आप जानते होंगे, कितना कुछ करना पड़ा होगा।
और उस ग्यारह में भी अब सिर्फ तीन जिले ही ऐसे बचे हैं, जो सबसे अधिक नक्सल प्रभावित हैं।
साथियों, बीते दशक में हज़ारों नक्सलियों ने हथियार डाले हैं।
मैं आपको पिछले 75 घंटों का आंकड़ा देता हूं।
Only 75 hours, मै जनता हूँ की ये मीडिया का main न्यूज़ नहीं है लेकिन मेरे जीवन का एक बहुत बड़ा संतोष का विषय है ये।
इन 75 घंटों में 303 नक्सलियों ने सरेंडर किया है।
एक जमाने में जिनका 303 चलता था, आज वो 303 सरेंडर हुए हैं। ये कोई सामान्य नक्सली नहीं हैं…
किसी पर 1 करोड़ का इनाम था…
किसी पर 15 लाख का इनाम था…
किसी पर 5 लाख का इनाम था।
और ये सारे के सारे, इनके नामो पर इनाम घोषित हुए थे
इन नक्सलियों से बहुत बड़ी मात्रा में हथियार भी पकड़े गए हैं।
ये सारे लोग अब बंदूकें छोड़ करके, बम छोड़ करके, भारत के संविधान को गले लगाने के लिए तैयार हुए हैं और जब संविधान के लिए पूर्ण समर्पित सरकार होती है न तब गलत रास्ते पे गया हुआ व्यक्ति भी लौट के अपने आंखों को उस संविधान पर टीका देता है। अब वो विकास की मुख्यधारा में वापस आ रहे हैं।
और ये लोग स्वीकार कर रहे हैं कि वो गलत रास्ते पर थे। 5 5 दशक बीता दिए, जवानी खपा दी पर उन्होंने जो सोचा था वो परिवर्तन नहीं आया।
अब ये भारत के संविधान पर विश्वास करते हुए आगे बढ़ेंगे।
साथियों,
कभी मीडिया की हेडलाइंस हुआ करती थीं..
छत्तीसगढ़ के बस्तर में ये हुआ..वो हुआ…
एक पूरी बस को उड़ा दिया, इतने सुरक्षा बल के जवान मारे गए
बस्तर नक्सलियों का गढ़ हुआ करता था…
और अब आज मैं उसी बस्तर का उदाहरण देता हूं, वहां के आदिवासी नौजवान बस्तर ओलंपिक का आयोजन कर रहे हैं और लाखों नौजवान बस्तर ओलंपिक में आके खेल के मैदान में ताकत दिखा रहें हैं।
साथियों,
इस बार माओवादी आतंक से मुक्त क्षेत्रों में दीवाली की रौनक कुछ और होने जा रही है। 50 55 साल हुए दिवाली नहीं देखी थी उन्होंने। अब दिवाली देखेंगे।
और मुझे पक्का विश्वास है दोस्तों कि हमारी मेहनत रंग लाएगी।
वहां भी इस बार खुशियों के दीए जलेंगे।
और मैं आज NDTV के दर्शकों को विश्वास दिलाता हूं।
वो दिन दूर नहीं, जब देश नक्सलवाद से…माओवादी आतंक से पूरी तरह मुक्त होगा।
और ये भी मोदी की गारंटी है।









