
आर्टिकल
एयर मार्शल अनिल चोपड़ा (सेवानिवृत्त)

Raipur chhattisgarh VISHESH / लेखक पीवीएसएम एवीएसएम वीएम वीएसएम हैं। फाइटर पायलट। वे एक टेस्ट पायलट रहे हैं, जिन्होंने मिराज 2000 स्क्वाड्रन तथा पश्चिमी और पूर्वी, दोनों क्षेत्रों में संचालन एयरबेस की कमान संभाली है। वे जम्मू और कश्मीर में वायु सेना प्रमुख रहे। सेवानिवृत्ति के बाद वे सशस्त्र बल न्यायाधिकरण और जेएनयू के कार्यकारी परिषद के सदस्य रहे। एक लेखक के रूप में उनकी 9 किताबें और 1150 लेख प्रकाशित हो चुके हैं। वर्तमान में, वे ‘भारतीय रक्षा निर्माता संघ’ (एसआईडीएम) के रणनीतिक सलाहकार हैं।
6–7 मई 2025 की रात को, भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ लॉन्च किया — यह 22 अप्रैल को हुए पहलगाम आतंकी हमले, जिसमें 26 बेकसूर लोगों की जान चली गई थी, के जवाब में चलाया गया एक सुनियोजित और समयबद्ध सैन्य अभियान था। इसके बाद अगले 88 घंटों में जो कुछ हुआ, वह महज़ एक सैन्य हमला भर नहीं था, बल्कि यह भारत के नए और पूरी तरह से विकसित रणनीतिक सिद्धांत का प्रदर्शन था: एक ऐसा सिद्धांत, जिसे स्पष्ट उद्देश्य, तकनीकी आत्मनिर्भरता, राजनीतिक दृढ़ इच्छाशक्ति और पूरे राष्ट्र की एकजुटता से परिभाषित किया जा सकता है। ऑपरेशन सिंदूर ने परमाणु हथियारों से लैस पड़ोसी देशों के बीच सैन्य टकराव के नियमों को फिर से लिखा और एक ऐसी मिसाल कायम की, जो आने वाले कई दशकों तक दक्षिण एशिया की सुरक्षा की दिशा तय करेगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहली बार भारत ने एक ऐसे दुश्मन के खिलाफ लड़ाई लड़ी — और जीत हासिल की — जो असल में एक ही मोर्चे पर दो देशों की संयुक्त ताकत के रूप में सामने आया था। चीन ने खुद को इस मामले से अलग रखा, लेकिन उसने पाकिस्तान को सक्रिय उपग्रह खुफिया जानकारी, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में सहायता, साइबर सहायता और पीएल-15 जैसी ‘दृष्टि-सीमा से परे’ (बीवीआर) मिसाइलों सहित अग्रिम मोर्चे के सैन्य साजो-सामान भी उपलब्ध कराए। भारत ने इन दोनों की संयुक्त ताकत को परास्त किया।
नियंत्रित युद्ध का सिद्धांत
आधुनिक संघर्षों की एक प्रमुख विफलता — रूस-यूक्रेन युद्ध के पाँच साल लंबे संघर्ष से लेकर पश्चिम एशिया के युद्ध क्षेत्र तक — यह रही है कि इनमें बाहर निकलने की कोई रणनीति नहीं होती। ऐसे अभियान, जिनका कोई निश्चित अंत न हो, अर्थव्यवस्थाओं को कमज़ोर करते हैं, जनता के मनोबल को गिराते हैं तथा न तो जीत दिलाते हैं और न ही शांति। इन क्षेत्रों में अमेरिका का पहले ही 27.68 अरब डॉलर से ज़्यादा खर्च हो चुका है और इसका कोई निश्चित अंत भी नज़र नहीं आ रहा है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने सोच-समझकर इस जाल से खुद को बचाया; उसने वह कर दिखाया जो बहुत कम आधुनिक सेनाएँ कर पाती हैं: पहली मिसाइल दागे जाने से पहले ही सफलता की परिभाषा तय कर लेना।
भारत इस अभियान में अपने उद्देश्य को लेकर पूरी तरह स्पष्ट था: आतंकी ढांचे और उसे पनाह देने वालों को खत्म करना, दुश्मन को ज़्यादा से ज़्यादा नुकसान पहुंचाना और अपनी शर्तों पर बाहर निकल आना — जिसमें किसी भी तरफ़ आम नागरिकों को कोई नुकसान न हो। राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने पर्याप्त खुफिया जानकारी के आधार पर नौ लक्ष्य निर्धारित किये; इनमें से प्रत्येक को लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, और हिज़बुल मुजाहिदीन के आतंकवादी इकोसिस्टम को बनाए रखने में उनकी विशिष्ट भूमिका के लिए चुना गया था। पहला हमला सिर्फ़ 23 मिनट में पूरा कर लिया गया। पूरा अभियान 88 घंटों के अंदर खत्म हो गया, इसके बाद भारत ने दुश्मन को अपनी शर्तों पर युद्धविराम के लिए मजबूर कर दिया — यह युद्धविराम बातचीत से नहीं, बल्कि दुश्मन को और भी ज़्यादा और बड़ा नुकसान पहुंचाने की प्रदर्शित क्षमता के कारण हुआ।
यह सिद्धांत — उद्देश्य के साथ प्रवेश करना, सटीकता के साथ कार्य करना और बिना किसी अतिरेक के बाहर निकलना — नियंत्रित युद्ध की एक ऐसी शैली है, जिसका प्रदर्शन आधुनिक सैन्य इतिहास में विरले ही देखने को मिलता है। आने वाले वर्षों में, इसका स्टाफ कॉलेजों में गहन अध्ययन किया जाएगा।
दुश्मन के गढ़ में गहरी चोट
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के भौगोलिक दायरे ने पिछली सभी सीमाओं को तोड़ दिया। भारत ने अपने शुरुआती हमले सिर्फ़ पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू और कश्मीर (पीओजेके) तक ही सीमित नहीं रखे, बल्कि वह पाकिस्तान के मुख्य भूभाग पंजाब के भी काफ़ी अंदर तक पहुँच गया। सियालकोट और बहावलपुर में मौजूद ठिकानों पर—जिनमें से बहावलपुर भारतीय सीमा से 140 किलोमीटर से भी ज़्यादा दूर है—बेहद सटीक हमले किए गए। बाद में, रावलपिंडी के पास स्थित नूर खान एयरबेस और सरगोधा में मौजूद परमाणु-वाहक बेस जैसे अहम सैन्य ठिकानों को भी भारत की प्रभावी मारक क्षमता के दायरे में ले आया गया। नूर खान एयरबेस पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद और वहाँ के सेना मुख्यालय रावलपिंडी के एकदम नजदीक है; जबकि सरगोधा में पाकिस्तान के परमाणु हथियारों को हवाई मार्ग से पहुँचाने वाले साजो-सामान मौजूद हैं। संदेश स्पष्ट था: कोई भी ठिकाना हमारी पहुँच से बाहर नहीं है।
100 से ज़्यादा आतंकवादियों को मार गिराया गया, जिनमें कुछ बड़े आतंकवादी भी थे: आईसी -814 अपहरण से जुड़ा यूसुफ़ अज़हर, अब्दुल मलिक रऊफ़ और पुलवामा हमले से जुड़ा मुदस्सिर अहमद। जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अज़हर के परिवार के दस सदस्यों को बहावलपुर स्थित मुख्यालय में मार गिराया गया। इन हमलों ने पाकिस्तान की शह पर काम करने वाले सबसे खतरनाक आतंकवादी संगठनों की कमान-व्यवस्था को पूरी तरह से तबाह कर दिया।
शायद सबसे अहम बात यह है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने परमाणु ब्लैकमेल की पोल खोल दी। दशकों तक, पाकिस्तान की परमाणु छत्रछाया का इस्तेमाल राज्य-प्रायोजित आतंकवाद को छूट देने के लिए किया जाता रहा — इसके पीछे एक अनकहा अनुमान यह था कि भारत कभी भी तनाव बढ़ाने का जोखिम नहीं उठाएगा। भारत ने इस अनुमान को पूरी तरह से धवस्त कर दिया। भारत की गहरे और निर्णायक रूप से हमला करने की तत्परता — जिसमें पाकिस्तान के परमाणु हवाई बेड़े वाले ठिकाने पर हमला भी शामिल था — ने साबित कर दिया कि समीकरण अब हमेशा के लिए बदल चुका है। जिस दिन भारत ने सरगोधा पर हमला किया, दक्षिण एशिया में प्रतिरोध का भूगोल हमेशा के लिए बदल गया।
सीमा-पार अधिकतम क्षति, देश के भीतर न्यूनतम प्रभाव
अधिकांश युद्धों में, नुकसान एक जगह तक सीमित नहीं रहता। यह सीमाओं, अर्थव्यवस्थाओं और आम नागरिकों के जीवन तक फैल जाता है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने इस प्रारूप को निर्णायक रूप से तोड़ दिया। भारत ने पाकिस्तान के आतंकी और सैन्य ढाँचे को गंभीर और लक्षित नुकसान पहुँचाया, जबकि अपने देश में इसका असर लगभग शून्य रहा — परमाणु हथियारों से लैस देशों के बीच, आधुनिक इतिहास में यह असंतुलित प्रभाव का बेजोड़ उदाहरण है।
भारतीय वायु सेना (आईएएफ) ने पाकिस्तान के चीन से मिले वायु रक्षा प्रणालियों को चकमा दिया और जाम कर दिया। राफेल जेट, स्कैल्प क्रूज़ मिसाइलों और हैमर सटीकता-निर्देशित बमों का इस्तेमाल करते हुए, आईएएफ ने सिर्फ़ 23 मिनट में अपनी शुरुआती हमलावर कार्रवाई पूरी कर ली। 9-10 मई को, जब पाकिस्तान ने भारत के नागरिक और सैन्य ठिकानों पर जवाबी हमला किया, तो भारत ने एक ही समन्वित ऑपरेशन में पाकिस्तान के 11 सैन्य हवाई अड्डों पर हमला किया — इतिहास में यह पहली बार था, जब किसी देश ने एक ही समय पर किसी परमाणु-सशस्त्र देश के खिलाफ़ ऐसा किया हो। इस हमले में पाकिस्तान वायु सेना की लगभग 20 प्रतिशत परिसंपत्ति नष्ट हो गई। भोलारी सैन्य हवाई अड्डे पर भारी जान-माल का नुकसान हुआ; जिसमें अग्रिम पंक्ति के लड़ाकू विमान, हैंगर में खड़े बेहतरीन एफ-16 लड़ाकू विमान और रनवे पर मौजूद एईडब्लूएंडसी विमान भी नष्ट हो गए।
प्रतिरक्षा के मोर्चे पर, भारत की बहु-स्तरीय हवाई रक्षा प्रणाली — जिसे स्वदेशी आईएसीसीएस और आकाशतीर कमांड-एंड-कंट्रोल प्रणाली, एस-400, आकाश और एमआरएसएएम बैटरियों का समर्थन प्राप्त है — ने पाकिस्तान से आने वाले सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलों को लगभग 100 प्रतिशत सफलता दर के साथ बीच में ही रोककर नष्ट कर दिया। पाकिस्तान ने चीन में बने ड्रोन, तुर्की के बायराक्तार यूसीएवी, क्रूज़ मिसाइलें और यहाँ तक कि दिल्ली को निशाना बनाकर एक फतह-II रॉकेट भी तैनात किया था। इन सभी को रोक दिया गया। भारत का आसमान पूरी तरह सुरक्षित रहा। भारत ने एस-400 मिसाइल के ज़रिए अब तक की सबसे लंबी दूरी पर निशाना साधने का कीर्तिमान भी बनाया; लगभग 314 किलोमीटर की दूरी पर हवा में मौजूद एक पाकिस्तानी एईडब्लूएंडसी विमान को नष्ट कर दिया। यह असंतुलन — एक तरफ़ भारी तबाही, तो दूसरी तरफ़ पूरी तरह नियंत्रण — अब इस बात का नया पैमाना बन गया है कि एक अच्छी तरह से तैयार, तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर लोकतंत्र क्या हासिल कर सकता है।
समन्वय, आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण: एक दशक की उपलब्धि
‘ऑपरेशन सिंदूर’ की सफलता ‘जय’ के सिद्धांत पर आधारित थी: समन्वय, आत्मनिर्भरता और स्वदेशीकरण। तीनों सेनाओं ने एक-दूसरे के साथ बेहतरीन तालमेल बिठाकर काम किया। नौसेना के ‘कैरियर बैटल ग्रुप’ ने अरब सागर में अपना दबदबा बनाए रखा, जिससे पाकिस्तान के नौसेना विकल्प पूरी तरह से बंद हो गए और दक्षिण की ओर किसी भी तरह के तनाव को बढ़ने से रोक दिया गया। वायुसेना ने पूरे पाकिस्तान में सटीक और गंभीर हमले किए। थल सेना ने स्वदेशी वायु रक्षा प्रणालियों की मदद से आने वाले खतरों को बेअसर कर दिया और बेहद सटीक तरीके से घूमकर हमला करने वाले हथियार का इस्तेमाल किया। 2019 में ‘चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ’ के पद के गठन से और भी मज़बूत हुई इस संयुक्त व्यवस्था ने, ऑपरेशन के हर चरण में निर्बाध काम किया।
स्वदेशी पहलू भी उतना ही निर्णायक था। भारत का रक्षा उत्पादन 2014–15 के ₹46,429 करोड़ से बढ़कर 2024–25 में रिकॉर्ड ₹1.54 लाख करोड़ हो गया है, जिसमें अब 65 प्रतिशत से अधिक उपकरण घरेलू स्तर पर निर्मित किए जाते हैं। इस बदलाव — जिसे उदार एफडीआई, उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं, समर्पित रक्षा गलियारों और आईडेक्स नवाचार रूपरेखा से गति मिली है — का अर्थ है कि जब देश को कम समय में उन्नत क्षमताओं की आवश्यकता हुई, तो उसके पास बाहरी आपूर्ति श्रृंखलाओं पर बिना निर्भर हुए कार्य करने की संप्रभु शक्ति मौजूद थी।
ब्रह्मोस क्रूज़ मिसाइल, सतह-से-हवा में मार करने वाली आकाश मिसाइल, घूमकर हमला करने वाली स्काईस्ट्राइकर और डीआरडीओ के डी-4 एंटी-ड्रोन प्लेटफ़ॉर्म जैसी प्रणालियों ने सशस्त्र बलों को सभी क्षेत्रों में सटीकता, सुरक्षा और वर्चस्व प्रदान किया। पाकिस्तान द्वारा दागी गई, लेकिन अपने लक्ष्य को भेदने में असफल रही तथा पूरी तरह से सुरक्षित रूप में बरामद की गयी चीनी पीएल-15 मिसाइल, चीनी उपकरणों की विज्ञापित क्षमताओं और युद्ध-क्षेत्र की वास्तविकताओं के बीच के अंतर का प्रतीक बन गई। इस मिसाइल का गहन तकनीकी विश्लेषण किया जाएगा। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने “भारत के लिए निर्मित” से “भारत द्वारा निर्मित” की ओर एक निर्णायक बदलाव को रेखांकित किया।
राजनीतिक इच्छाशक्ति की निर्णायक ताकत
सैन्य क्षमता, चाहे कितनी भी मजबूत क्यों न हो, केवल उसी हद तक प्रभावी होती है, जितना कि उसके पीछे का राजनीतिक निर्देश। पिछली भारतीय सरकारों ने पाकिस्तान-समर्थित आतंकवाद का जवाब ऐसी दस्तावेजों से दिया था जिन्हें खारिज कर दिया गया; ऐसी कूटनीति से दिया जिसका कभी जवाब नहीं मिला; और ऐसे संयम से दिया जिसे अक्सर कमज़ोरी के रूप में इस्तेमाल किया गया। यह समीकरण तब हमेशा के लिए बदल गया, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की—शुरू से लेकर आखिर तक—पूरी राजनीतिक ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर ले ली और सशस्त्र बलों को बिना किसी हिचकिचाहट और बिना किसी शर्त के कार्रवाई करने की स्पष्ट अनुमति दे दी।
मोदी ने सेना को एक स्पष्ट निर्देश दिया: आतंकवादियों और उनके समर्थकों पर, वे जहाँ भी सक्रिय हों, हमला करें; लेकिन किसी भी आम नागरिक को कोई नुकसान नहीं पहुँचना चाहिए। हर कदम — सिंधु जल संधि को निलंबित करने से लेकर सैन्य हमलों के सटीक क्रम तक — सोच-समझकर और सही समय पर उठाया गया था। संधि का निलंबन केवल प्रतीकात्मक नहीं था। पानी को एक दीर्घकालिक रणनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की भारत की इच्छा का संकेत देकर, इसने पाकिस्तान पर एक ऐसा बोझ डाला, जो किसी भी युद्धविराम से कहीं अधिक गहरा है और जिसकी टीस आने वाली कई पीढ़ियों तक महसूस की जाएगी। जैसे-जैसे पाकिस्तान ने तनाव बढ़ाया, सशस्त्र बलों के पास यह स्थायी अधिकार सुरक्षित रहा कि वे बिना किसी राजनीतिक मंज़ूरी के, अपनी ज़रूरत के हिसाब से किसी भी तरीके से जवाबी कार्रवाई कर सकते हैं।
सैन्य अभियान के साथ-साथ उतनी ही सटीक कूटनीतिक रणनीति भी अपनाई गई। भारत ने कूटनीति की एक मजबूत दीवार खड़ी कर दी: पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग कर दिया और यह सुनिश्चित किया कि विरोधी प्रतिक्रिया शुरू होने से पहले ही वैध आत्मरक्षा की बात वैश्विक स्तर पर स्थापित हो जाए। 32 देशों में सात द्विदलीय संसदीय प्रतिनिधिमंडल भेजे गए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मतभेद स्पष्ट रूप से सामने आए: अधिकांश देशों ने आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ एकजुटता दिखाई, जबकि चीन और तुर्की खुले तौर पर पाकिस्तान के साथ खड़े रहे और उसे सैन्य साजो-सामान, उपग्रह खुफिया जानकारी और कूटनीतिक समर्थन मुहैया कराते रहे। उनके इस गठबंधन पर ध्यान दिया गया है। यह आने वाले वर्षों में भारत की रणनीतिक साझेदारियों को आकार देगा।
एकजुट राष्ट्र: ‘संपूर्ण राष्ट्र’ का दृष्टिकोण
‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने यह साबित कर दिया कि आधुनिक युद्ध पर अब केवल सशस्त्र बलों का ही एकाधिकार नहीं रह गया है। यह ‘पूरे राष्ट्र’ के दृष्टिकोण का एक जीवंत अभ्यास बन गया — जिसमें सेना, उद्योग जगत, अंतरिक्ष, खुफिया तंत्र, नागरिक प्रशासन और जनसंचार — सभी ने एक एकल एकीकृत प्रणाली के रूप में कार्य किया और इसका प्रत्येक घटक दूसरे को मजबूती प्रदान करता रहा।
इसरो ने तीनों सेनाओं के लिए उच्च-गुणवत्ता निगरानी प्रदान करने हेतु चौबीसों घंटे कार्यरत कम से कम 10 उपग्रह समर्पित किये, जबकि राष्ट्रीय तकनीकी अनुसंधान संगठन (एनटीआरओ) ने लक्ष्य से जुड़ी अहम जानकारी दी। हर हमले के कुछ ही घंटों के अंदर लड़ाई में हुए नुकसान का मूल्यांकन (बीडीए) की तस्वीरें ली गईं, उनकी पुष्टि की गई और उन्हें सार्वजनिक रूप से जारी कर दिया गया; इससे पाकिस्तान द्वारा गलत जानकारी फैलाने से पहले ही उसे रोक दिया गया। जब पाकिस्तान ने दावा किया कि उसने भारत की एस-400 प्रणाली को तबाह कर दिया है, तो प्रधानमंत्री मोदी आदमपुर एयरबेस गए और दुनिया को दिखाने के लिए एक पूरी तरह सुरक्षित बैटरी के पास खड़े हुए। जानकारी की यह लड़ाई भी हवाई लड़ाई की जितनी ही सख्ती और तैयारी के साथ लड़ी गई।
शुरुआत से ही नागरिक प्रशासन को सैन्य लक्ष्यों के साथ एकीकृत किया गया था। सैन्य योजनाकारों के साथ-साथ प्रशासन अधिकारियों और ज़िला प्रशासकों को जानकारी दी जाती थी। देशव्यापी मॉक ड्रिल ने जनता का विश्वास बढ़ाया और राष्ट्रीय संकल्प को प्रदर्शित किया। निजी कंपनियों और स्टार्टअप्स ने आई-डेक्स फ्रेमवर्क के माध्यम से वास्तविक समय में समाधानों में योगदान दिया, जिनमें घूमकर हमला करने वाले हथियार और यूएएस-रोधी प्रणाली शामिल थी; इससे यह साबित हुआ कि भारत का रक्षा-औद्योगिक आधार वास्तव में एक युद्धकालीन परिसंपत्ति के रूप में परिपक्व हो चुका है।
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान आर्थिक कूटनीति भी साथ-साथ चलती रही। भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित कर दिया, अटारी इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट को बंद कर दिया, पाकिस्तानी वीज़ा रद्द कर दिए, पाकिस्तानी कलाकारों पर प्रतिबंध लगा दिया और सभी द्विपक्षीय व्यापार को रोक दिया — इस तरह भारत ने पाकिस्तान पर एक के बाद एक बढ़ता हुआ दबाव डाला, जिसने पाकिस्तान को यह सुविधा नहीं दी कि वह संघर्ष को केवल एक सीमित सैन्य टकराव के रूप में देख सके, जिसका उसकी अर्थव्यवस्था या अंतरराष्ट्रीय स्थिति पर कोई व्यापक प्रभाव न हो।
निष्कर्ष: एक नया सामान्य, एक नई ज़िम्मेदारी
‘ऑपरेशन सिंदूर’ महज़ एक सैन्य परिघटना नहीं थी। यह एक परिपक्व और एकीकृत रणनीतिक सिद्धांत का प्रदर्शन था—एक ऐसा सिद्धांत जो राजनीतिक इच्छाशक्ति, स्वदेशी क्षमता, संयुक्त युद्ध-कौशल, नियंत्रित तनाव-वृद्धि, सूचना-वर्चस्व और संपूर्ण राष्ट्र की एकजुटता को राज-कौशल के एक सुसंगत माध्यम में पिरो देता है।
इन छह रणनीतिक आयामों में, भारत ने दक्षिण एशिया में युद्ध के नियमों को नए सिरे से परिभाषित किया। इसने यह दिखाया कि परमाणु सुरक्षा कवच से राज्य-प्रायोजित आतंकवाद को छूट नहीं मिल सकती। इसने यह साबित किया कि स्वदेशी रक्षा निवेश के एक दशक के जरिये निर्णायक युद्धक्षेत्र परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। इसने दिखाया कि लोकतांत्रिक राजनीतिक इच्छाशक्ति, जिसे स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया हो और लगातार क्रियान्वित किया गया हो, सबसे शक्तिशाली बल-गुणक बनी रहती है। व्यापक क्षेत्र के लिए संदेश स्पष्ट है: संयुक्त निवारक के रूप में पुरानी व्यवस्था – यानि पाकिस्तानी आतंकी ढांचा, चीनी सैन्य उपकरण और परमाणु धमकी – का परीक्षण हो चुका है और यह विफल साबित हुआ है।
लेकिन, काम अभी खत्म नहीं हुआ है। फाइटर स्क्वाड्रन की संख्या को फिर से बनाना होगा, एईडब्लूएंडसी और हवा में ईंधन भरने वाले बेड़े का विस्तार करना होगा, ड्रोन और घूमते हुए हमला करने वाले हथियारों के भंडार को बढ़ाना होगा, और रक्षा बजट में —जैसा कि कुछ विश्लेषकों का मानना है—चरणबद्ध तरीके से जीडीपी के 3 प्रतिशत तक की वृद्धि करनी होगी। हाइपरसोनिक ब्रह्मोस II, पांचवीं पीढ़ी के एएमसीए लड़ाकू विमान और स्वदेशी हरॉप-श्रेणी के ड्रोन के विकास की गति तेज करनी होगी। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने एक नया सामान्य स्तर स्थापित कर दिया है। अब रणनीतिक अनिवार्यता यह सुनिश्चित करना है कि इससे जो असमान लाभ सामने आया है, उसे कभी भी कम न होने दिया जाए—क्योंकि विरोधी ने पहले ही इस पर ध्यान दिया है और वह स्थिर नहीं रहेगा।
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