263.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर के वस्तर और परिधान आयात बाजार में बिना किसी शुल्क के प्रवेश
प्रविष्टि तिथि: 27 JAN 2026 6:25PM by PIB Delhi

भारत और यूरोपीय संघ (ईयू) ने मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर बातचीत पूरी होने की घोषणा की है, जो भारत की सबसे रणनीतिक आर्थिक साझेदारियों में से एक में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। नियम-आधारित व्यापार साझेदारी पर आधारित यह एफटीए समकालीन वैश्विक चुनौतियों का समाधान करते हुए विश्व की चौथी और दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच गहरे बाजार एकीकरण को सक्षम बनाता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद, यूरोपीय संघ भारत के वस्त्र और परिधान निर्यात का दूसरा सबसे बड़ा गंतव्य है। यूरोपीय संघ का कुल वैश्विक वस्त्र एवं परिधान आयात 2024 में 263.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर था, जो भारतीय वस्त्र निर्यातकों के लिए यूरोपीय संघ के बाजार के बड़े स्तर और दीर्घकालिक क्षमता को रेखांकित करता है। बीते 5 वर्ष में यूरोपीय संघ में भारत के वस्त्र निर्यात में भी सकारात्मक बढ़ोतरी देखी गई है। यूरोपीय संघ में भारत का वस्त्र निर्यात कई वैल्यू-एडेड और श्रम-प्रधान क्षेत्रों में फैला हुआ है। रेडीमेड कपड़े (आरएमजी) निर्यात का सबसे बड़ा हिस्सा (~60%) हैं, इसके बाद सूती कपड़े (17%) और मानव निर्मित फाइबर और एमएमएफ कपड़े (12%) आते हैं। हस्तशिल्प (4%), कालीन (4%), जूट उत्पाद (1.5%), ऊनी उत्पाद (0.6%), हथकरघा (0.6%) और रेशमी उत्पाद (0.2%) यूरोपीय संघ में भारत के वस्त्र निर्यात का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो वस्त्र, परिधान और हस्तशिल्प के श्रम–प्रधान क्षेत्रों, कारीगरी और लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) के माध्यम से कार्यान्वित भारत के यूरोपीय बाजार के साथ वस्त्र व्यापार के स्वरूप को रेखांकित करते हैं।
वस्त्र और परिधानों पर सभी शुल्क श्रेणियों को कवर करते हुए शून्य शुल्क रखने और टैरिफ में 12% तक की कमी करने से यूरोपीय संघ का 22.9 लाख करोड़ रुपये (263.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर) का आयात बाजार खुल जाएगा। भारत का मौजूदा 3.19 लाख करोड़ रुपये (36.7 अरब अमेरिकी डॉलर) का वैश्विक वस्त्र और परिधान निर्यात, जिसमें यूरोपीय संघ को 62.7 हजार करोड़ रुपये (7.2 अरब अमेरिकी डॉलर) का निर्यात शामिल है, को देखते हुए, इस प्रकार की पहुंच से मौकों में, खासकर सूती धागे, मानव निर्मित फाइबर परिधान, रेडीमेड कपड़े, पुरुषों और महिलाओं के कपड़े और घर वाले वस्त्रों के क्षेत्र में, बड़ा विस्तार होगा। इससे एमएसएमई का विस्तार करने, रोजगार निर्माण करने और एक विश्वसनीय, संपोषित और हाई-वैल्यू सोर्स वाले सहयोगी के तौर पर भारत की स्थिति को मजबूत करने में मदद मिलेगी।





















