

आरती आहूजा तथा कार्तिक एमपी
Raipur chhattisgarh VISHESH : वर्ष 2047 तक भारत को 30 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना अनिवार्य है। फिलहाल श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी 41.7 प्रतिशत है और विकसित भारत का लक्ष्य इसे बढ़ाकर 70 प्रतिशत तक ले जाना है। लगभग 30-अंकों के इस अंतराल को पाटने का मूल मकसद राष्ट्रीय उत्पादकता को बढ़ाना तथा यह सुनिश्चित करना है कि भारत की विकास गाथा को सिर्फ आधे लोग ही नहीं, बल्कि सभी लोग आकार दें। शिक्षा, डिजिटल सुलभता और उद्यमिता के मामले में हुई प्रगति के बावजूद, अभी भी बहुत सी संभावनाओं का दोहन बाकी है। भारत को एक ऐसा श्रम इकोसिस्टम तैयार करना होगा जो महिलाओं को प्रवेश करने, टिके रहने तथा आगे बढ़ने में समर्थ बनाए और भारत के एकीकृत श्रम संहिताओं का कार्यान्वयन इन प्रणालीगत बाधाओं को दूर करने और समावेशन को उत्पादकता में बदलने का एक दुर्लभ मौका देता है।
जरा गौर करें – ई-श्रम पर पंजीकृत सीता नाम की उत्तर प्रदेश की एक श्रमिक बच्चों की देखभाल की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं होने के चलते अपने दो बच्चों का पालन-पोषण करते हुए, घर बैठकर एक ठेकेदार के लिए कपड़े सिलती है। इससे उसे एक अनियमित आय होती है। उनके जैसी महिलाओं के लिए, नई श्रम संहिताएं एक बड़ा परिवर्तनकारी कदम साबित हो सकती हैं। पास की एक कपड़ा फैक्ट्री अब औपचारिक अनुबंधों के साथ अलग-अलग पालियों में काम करने के लिए महिलाओं की भर्ती कर रही है। पहली बार, भारत के श्रम कानूनों का ढांचा सीता जैसी लाखों महिलाओं के लिए बाधक होने के बजाय उनका संबल बनने के लिए तैयार है।
वर्ष 2019 और 2020 के बीच अधिनियमित श्रम संहिताएं 29 बिखरे कानूनों को चार सुव्यवस्थित ढांचों – मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, पेशेगत सुरक्षा और औद्योगिक संबंध संहिताओं – में समेकित करती हैं। यह विधायी मंशा साहसिक है और अब अनेक राज्य तेजी से इन्हें लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। भारत के पास इस मंशा को प्रभाव में बदलने का एक महत्वपूर्ण मौका है और यह प्रभाव कुछ इस किस्म का है।
सामाजिक सुरक्षा: पहले कदम के रूप में दृश्यता
सामाजिक सुरक्षा संहिता मातृत्व, स्वास्थ्य बीमा, पेंशन और बच्चों की देखभाल से जुड़े पहलुओं को शामिल करते हुए गिग और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के लिए एक राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड की स्थापना करती है। ई-श्रम पोर्टल पर 30.6 करोड़ से अधिक श्रमिक पंजीकृत हैं, जिनमें से 53 प्रतिशत यानी 16 करोड़ महिलाएं हैं। इस पोर्टल और आधार आधारित यूएएन के बीच का जुड़ाव (लिंकेज) इन हकों को किसी भी स्थान पर और किसी भी क्षेत्र (सेक्टर) में दिलाया जाना संभव बनाता है। यह बुनियादी ढांचा बच्चे के जन्म या देखभाल जैसे जीवन के प्रमुख बदलवों के दौरान होने वाली क्षति को कम कर सकता है।
दृश्यता तो महज पहला कदम भर है। पंजीकरण को कल्याणकारी वितरण प्रणालियों से जोड़ने की प्रक्रिया में तेजी लाई जानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि महिलाओं के पास सिर्फ पहचान पत्र ही नहीं हो, बल्कि उन्हें वास्तविक सहायता भी मिले। इससे महिलाओं को उनके रोजगार चक्र में सुरक्षित व टिकाए रखने के तौर-तरीकों को नए सिरे से परिभाषित किया जा सकेगा।
आर्थिक अवसंरचना के रूप में देखभाल
किसी भी महिला से अगर नौकरी छोड़ने की वजहों के बारे में पूछिए, तो अक्सर एक ही जवाब मिलेगा – बच्चों की देखभाल। पेशेगत सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कामकाज की स्थिति से संबंधित संहिता इसी समस्या से निपटती है। यह देश के लगभग 62 प्रतिशत श्रमिकों को रोजगार देने वाले सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के समूहों को संयुक्त रूप से क्रेच स्थापित करने, देखभाल की लागत को वितरित करने और इसे अनुपालन संबंधी बोझ से हटकर एक सक्षमकारी आर्थिक अवसंरचना में परिवर्तित करने में सक्षम बनाती है। राज्यों को अब उद्योग संघों के साथ मिलकर इन क्रेचों को बड़े पैमाने पर संचालित करना होगा। विशेष रूप से औद्योगिक गलियारों और एसईजेड में, ताकि किसी भी मां को नौकरी और अपने बच्चे की देखभाल के बीच चुनना न पड़े।
चौबीसों घंटे चलने वाली अर्थव्यवस्था के दरवाजे खोलना
ओएसएच संहिता की धारा 43 महिलाओं को किसी भी क्षेत्र में काम करने की अनुमति देती है। इसमें शाम 7 बजे से सुबह 6 बजे तक की रात की पाली और यहां तक कि खदानों में काम करना भी शामिल है, बशर्ते उनकी सहमति हो और पर्याप्त सुरक्षा संबंधी उपाय सुनिश्चित किए जाएं। आर्थिक तर्क स्पष्ट है। महिलाओं को चौबीसों घंटे संचालित होने वाले विकास के क्षेत्रों में भाग लेने में समर्थ बनाना, समावेशिता और प्रतिस्पर्धात्मकता की दृष्टि से लाभदायक स्थिति पैदा करता है। जैसे-जैसे सर्वोत्तम कार्यप्रणालियां उभर कर सामने आयेंगी और राज्यों के बीच साझा की जायेंगी, इन सक्षमकारी प्रावधानों को व्यापक रूप से अपनए जाने और उनमें सुधार किए जाने की उम्मीदें भी बढ़ेंगी।
मेज पर एक जगह; महिलाओं की आवाज को संस्थागत बनाना
मजदूरी संहिता – जोकि सर्वाधिक विचारपूर्ण सुधारों में से एक है – सभी केन्द्रीय और राज्य सलाहकार बोर्डों में एक तिहाई महिला सदस्यों का होना अनिवार्य करती है। यह संस्थागत डिजाइन ऐसी नीतियों के निर्माण के लिए आवश्यक है जो विविध प्रकार के श्रमिकों की हकीकतों को दर्शाएं और समावेशन को एक सोची-समझी चीज के बजाय आधारभूत तत्व बनाएं। जैसे-जैसे ज्यादा से ज्यादा राज्य इन बोर्डों को सक्रिय करेंगे, लैंगिक रूप से संवेदनशील नीति निर्माण हाशिये से उठकर मुख्यधारा में आ जाएगा।
नई श्रम संहिताएं एक आधारभूत अवसर प्रदान करती हैं और अब जबकि केन्द्र ने आधार तैयार कर दिया है, तो असली बदलाव राज्यों के स्तर पर होगा तथा हमारी क्षमता भी बढ़ेगी। जो राज्य तेजी से नियमों को सुसंगत बनाएंगे, सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों को समन्वित करेंगे, सलाहकार बोर्डों को सक्रिय करेंगे तथा लिंग-आधारित परिणामों पर नजर रखेंगे, वे रोजगार के मानकों के मामले में अग्रणी होंगे। ये संहिताएं कोई अचूक उपाय भले ही न हों, लेकिन ये संरचनात्मक बाधाओं को दूर करने के दमदार उपाय जरूर हैं। सही तरीके से क्रियान्वित किए जाने पर, वे देश की प्रतिभा पाइपलाइन का विस्तार कर सकती हैं और हमारे जनसांख्यिकीय लाभांश को तेजी से बढ़ा सकती हैं। श्रम संहिताओं को नौकरशाही जनित सुधार के रूप में नहीं, बल्कि एक समावेशी अर्थव्यवस्था के आधार के रूप में देखा जाना चाहिए। इन संहिताओं के क्रियान्वयन के साथ, भारत को एक ऐसी प्रणाली बनाने की दिशा में निर्णायक रूप से कार्य करना होगा जो महिलाओं को लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि विकसित भारत के सह-शिल्पकार के रूप में देखे।
आरती आहूजा, पूर्व सचिव श्रम एवं रोजगार, भारत सरकार तथा
कार्तिक एमपी, सहायक उपाध्यक्ष – रणनीति एवं अनुसंधान, द उदयती फाउंडेशन






















