सात फेरे – श्रीमती माधुरी कर

Report manpreet singh

लक्ष्मीपुराण में एक प्रसंग है, जिसमें लक्ष्मी और विष्णु का जब विवाह हुआ, तब सात वचन एक दूसरे को देते समय लक्ष्मी कहती हैं कि यदि तीन कर्तव्यों के पालन में मुझसे कोई चूक हो, तभी आप मुझे दंड देंगे। पहला, आपको छोड़ सभी पुरुष मेरे पिता, भाई, या बेटे की नज़र से देखूँगी। दूसरा, थर के हर सदस्य को भोजन कराने के पश्चात् ही मैं भोजन करूँगी। तीसरा, परिवार-समाज- राष्ट्र के हित के विपरीत ऐसा कोई कार्य नहीं करूंगी, जिससे कलह हो। तब विष्णु भी कहते हैं कि मैं भी तुम्हें वचन देता कि मैं तुम्हें मानसिक, शारीरिक तथा आर्थिक कष्ट कभी नहीं दूँगा ।

पति को सुयोग्य बनाने और सन्मार्ग पर लाने की भूमिका निभाने में नारी कभी पीछे नहीं रही। पत्नी का धर्म हित साधन करना है | भारतीय नारी इस तेजस्विता का परिचय हमेशा देती आई है। मंदोदरी ने कड़े शब्दों में रावण को सावधान किया –

*” निकट काल जेहि आवत साईं। तेहि भ्रम होइ तुम्हारी नाई ॥

जिसका काल समीप आ जाता है, उसे आपकी तरह भ्रम होता है। आपकी मृत्यु निकट है। फिर भी रावण ने कभी मंदोदरी पर हाथ नहीं उठाया, न ही कभी जाने को कहा, केवल मानसिक कष्ट दिया। आर्थिक, शारीरिक संपन्नता के बावजूद उसका पतन हो गया, क्योंकि घड़े में एक भी छेद हो, तो पानी कब तक ठहरेगा! विद्योत्तमा ने निरक्षर कालिदास को महाकवि बना दिया। इसी प्रकार, सुविधा को महत्व न देकर तुलसीदास की प्रतिभा को कामुकता से मोड़ कर ईश्वर-भक्ति की ओर अग्रसर कर दिया। यह रत्नावली का सत्साहस ही था, जिसने समाज को तुलसी-जैसा संत और ‘मानस’ जैसा ग्रंथ उपलब्ध कराया। तारा ने भी अपने पति बाली को अनीति छोड़ने और नीति- पालन के लिए नारंबार आग्रह किया । ‘मानस’ के प्रारंभिक प्रकरण में लिखा है स्वायंभू मनु अरु सतरूपा । जिन्हें तैं भै नर सृष्टि अनूपाः ॥

स्वयंभू मनु और शतरूपा से मनुष्यों की अनुपम सृष्टि हुई

मानवीय गुणों से विभूषित होने के कारण ही उन्हें अनुपम कहा जाता है।

“दम्पति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्हके बीका ||”

उन दोनों पति-पत्नी के धर्म और आवरण अच्छे थे। आज भी शास्त्र उनकी मर्यादा का गान करते हैं। पत्नी और पति उच्चादर्शों का करके ही विवाह-यून में बँधे | सीता-राम, पानी हमारे आदर्श लक्ष्य है। वे केवल पुराणों के काल्पनिक पात्र नहीं है। वे हमारे जीवन के प्राव हैं ।

एक पौराणिक प्रसंग में राजा शर्याति अपने परिवार समेत वन बिहार को निकले। एक सरोवर के निकट पड़ाव डाला गया | बच्चे इधर-उधर खेल-कूद रहे थे। मिट्टी के ढेले के नीचे दो मणियों – जैसी चमकती दिखीं, तो राजकुमारी सुकन्या को कुतूहल हुआ । उसने लकड़ी के सहारे उन मणियों को निकालने का प्रयत्न किया, किंतु उनसे रक्त की धार बह निकली। सुकन्या को दुख भी हुआ, आश्चर्य भी । इस घटना का कारण जानने के लिए वह अपने पिता के पास पहुँची । राजा यह सुनकर स्तब्ध रह गए। उन्हें ज्ञात था कि समीप के टोले के नीचे ऋषि च्यवन तप कर रहे थे। राजा को लगा कि हो न हो, पुत्री से उन्हीं की आँखें फूट गई हैं। में सपरिवार घटना स्थल पर पहुँचे । देखा, वहाँ व्यवन ऋषि नेजहीन होकर कराह रहे हैं। राजा ने माना कि उसकी पुत्री से अनजाने में ही यह पाप हो गया है। उन्होंने उसके लिए मृथिवर से क्षमा माँगी, परंतु राजकुमारी सुकन्या ने अभूतपूर्व साहस का परिचय देते हुए पिता से कहा पिताजी, पाप का प्रायश्चित तो कर्ता को करना चाहिए | मैं आजीवन च्यवन कृषि की पत्नी बनकर उनकी सेवा करूँगी। यही मेरे कर्म का प्रायश्चित है। सुकन्या की घोषणा ने उसके पुण्य को सहजगुणित कर दिया। आत्मा सचमुच महान होगी, ऐसा विचार करके अनेक देवता उसको प्रणाम करने पहुँचे । राजा भी भाव-विभोर हो गए। विवाह की रस्म पूरी हुई। सुकन्या अंधे और वृद्ध पति को देवता मानकर प्रसन्न मन से धैर्यपूर्वक उनकी सेवा करने लगी । देवता उसकी साधना से प्रभावित हुए और अश्विनी कुमारों ने च्यवन ऋषि की वृद्धता और अंधेपन की दूर कर दिया। उन्हीं के नाम पर च्यवनप्राश प्रसिद्ध हुआ। सुकन्या का जीवन सार्थक हो गया ।

महाभारत के एक प्रसंग में अज्ञातवास में द्रौपदी से मिलने के लिए कृष्ण की पत्नी सत्यभामा गई। उन्होंने पाया कि उस अभावग्रस्त एवं कष्टसाध्य स्थिति में भी द्रौपदी प्रसन्न एवं स्वस्थ थीं। सत्यभामा को आश्चर्य हुआ और उन्होंने पूछा – हम महलों में रहकर भी सुखी नहीं हैं; तुम बनवास में भी प्रसन्न हो । सुख की कुंजी जो तुमने पाई है, द हमें भी बताओ। तब द्रौपदी ने मुस्कराते हुए कहा दुःखे न साध्वी लभते सुखानि ।”

जो दूसरों के लिए कष्ट उठाने को तैयार रहता है, उसे सदा सुख ही सुख मिलता है। व्यक्ति तब तक पूजनीय है, जब तक वह औरों के लिए जीता है तथा परिवार, समाज, राष्ट्र को सुखी रखने के लिए वह व्यक्तिगत स्वार्थ को त्याग देता है। कुछ तो ऐसे होते हैं, जिन्हें अपनी कमी नहीं दिखती, वे परिवारवालों पर थोपते है। उन्हें कबीर की ये पंक्तियाँ स्मरण रखनी चाहिए –

बुरा जो देखन में चला, बुरा न मिलिया कोय | जो दिल खोजा आपना, मुझ सा बुरा न होय ॥

सुकरात की पत्नी के कटु-कठोर व्यवहार को इंगित करते हुए सुकरात के शिष्यों ने पूछा- आप अपनी पत्नी के साथ कैसे रह लेते हैं ? सुकरात ने उत्तर दिया- जैसे जीभ और दाँत 1 गाँधी जी का विवाह बचपन में ही हो गया था । वे विदेश से पढ़कर लौटे और उसी पत्नी के साथ रहकर इतना बड़ा आजादी का तोहफा हमें दे गए । उपन्यास सम्राट् प्रेमचंद की पत्नी मायके चली गई। प्रेमचंद ने एक विधवा से विवाह किया। रविशंकर विश्वविद्यालय के प्रथम कुलपति डॉ० बाबूराम सक्सेना का भी बाल-विवाह हुआ था, वे अंतरराष्ट्रीय स्तर के भाषाविज्ञानी थे। इसी विश्ववि‌द्यालय के एक कुलपति प्रो बी० पी० चंद्रा का भी बाल-विवाह हुआ था, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर के भौतिकशास्त्री थे तथा जिन्हें देश-विदेश के अनेक सम्मान मिले। 2016 ई. में उन्हें जापान से 5 करोड़ का प्रोजेक्ट मिला था।

जिस तरह किसी पुस्तक को पढ़ने पर उस पुस्तक के बारे मैं हमें जानकारी मिलती है। वैसे ही जब हम परिवार समाज राष्ट्र से जब प्रेम करते हैं, तभी हमें अपना कर्तव्य-बोध होता है। प्रेम मजबूरी या बोझ नहीं है। प्रेम कर्तव्य, सेवा, त्याग के बल पर चलता आज तलाक के आँकड़े बता रहे हैं कि शिक्षा, पद, पैसे का अभाव न होते हुए भी तलाक की संख्या बढ़ती जा रही है। अभी हाल ही में एक खबर अखबार में छपी थी कि एक व्यक्ति ने कार में अपनी पत्नी को मार दिया । उसी कार में उसकी प्रेमिका बैठी थी । यदि इस तरह के अपराधियों को यदि कठोर दंड नहीं दिया गया, तो भयंकर दुष्परिणाम भोगने पड़ेंगे। ऐसी ही एक घटना केरल प्रांत की घरी, जिसमें पति ने पहली पहली को साँप से कटला दिया, जिससे वह दूसरी पत्नी रख सके। ऐसी घटनाएँ विभिन्न प्रांतों में आए दिन पह रही हैं। राजिम में संत पवन दीवान ने कई अनाथ लड़कियों का कन्यादान किया। इसके बावजूद अभी भी ऐसी लड़कियाँ हैं, जो शादीशुद्ध प्रतियों को अपने जाल में फँसाकर घर तबाह कर रही हैं। यदि ऐसे अपराधियों को आजन्म कारागार नहीं हुआ, तो सात फेरों का इंतज़ार नहीं होगा और समाज में अराजकता का बोलबाला होगा। शादीशुदा पुरुषों पर नसर डालना तीन तलाक से भी बदतर है।

एक व्यक्ति एक संत के पास अपनी जिज्ञासा लेकर पहुँचा। वह बोला- महाराज, मैं विवाह करना चाहता हूँ। मैंने अनेक युवतियों को देख भी लिखा, परंतु अभी तक मुझे कोई सबसे योग्य युवती नहीं मिली। संत बोले- बेरा, तुम पहले फूलों के बगीचे से सबसे सुंदर गुलाब का फूल तोड़ लाओ, लेकिन शर्त यह है कि एक बार आगे बढ़ने के बाद पीछे नहीं मुड़ना। थोड़ी देर बाद वह व्यक्ति खाली हाथ लौटा। संत ने पूछा- बेटा, तुम्हें कोई सुंदर फूल नहीं मिला ? वह व्यक्ति बोला – महाराज, मैं अच्छे से अच्छे फूल की चाहत में आगे बढ़ता गया कि आगे और भी सुंदर फूल होंगे. परंतु दुर्भाग्यवश अंत में फिर मुरझाए फूल मिले। संत बोले बेरा, भटकते रहोगे, तो जो संभव है, उससे भी हाथ धो बैठोगे । इसलिए जो प्राप्त हो सकता है, उसमें संतोष करने की वृत्ति पैदा करो। यही उचित समाधान है। हिंदू वैवाहिक परंपरा में सात फेरे व सात वचन होते हैं। कन्या सात वचन बर से लेती है और वर पाँच वचन कन्या से लेता है। तब कन्या वर के वामांग में बैठकर अर्धांगिनी कहलाती है। जो पतन से बचाए, वह पत्नी तथा जो धर्म से पति को जोड़ दे, वह धर्मवली कहलाती है। विवाह के बाद पुरुष को प्रति परमेश्वर की उपाधि मिलती है। ‘पति’ का अर्थ सुरक्षित रखनेवाला है, जैसे सेनापति और ‘ परमेश्वर’ का अर्थ न्यायकारी, परोपकारी और दया प्रेम-सेवा का पाठ पढ़ाने वाला एवं अपने जीवन में चरितार्थ करनेवाला है।

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